
mother lab nagaur
नागौर. जिला मुख्यालय स्थित जेएलएन राजकीय जिला अस्पताल में संचालित मदर लैब को लेकर राजस्थान पत्रिका द्वारा किए गए खुलासे के बाद अब मामला तूल पकड़ता जा रहा है। एक ओर जहां पत्रिका की पड़ताल में लैब संचालक द्वारा डॉक्टरों के निर्देश से अधिक जांचें किए जाने का मामला सामने आया, वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों ने सरकार को घेरते हुए सख्त कार्रवाई की मांग तेज कर दी है।
दरअसल, अस्पताल के एमसीएच विंग (पुराना परिसर) में हाल ही में शुरू की गई मदर लैब को निजी कंपनी के हवाले किया गया है। इसके तहत अस्पताल में आने वाले मरीजों की सभी जांचें इसी लैब में की जा रही हैं। लेकिन पत्रिका की जांच में सामने आया कि डॉक्टर जहां मरीज की पर्ची पर एक या दो जांच लिख रहे हैं, वहीं लैब संचालक अपनी ओर से दो से तीन अतिरिक्त जांचें जोड़कर रिपोर्ट जारी कर रहा है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका है, बल्कि जांचों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
अस्पताल के चिकित्सकों ने भी इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जिन जांचों की आवश्यकता नहीं है, उन्हें करने का कोई औचित्य नहीं है। चिकित्सकों के अनुसार, सीमित जांचों के बावजूद अतिरिक्त टेस्ट जोड़ना न केवल अनैतिक है, बल्कि मरीजों के इलाज की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।
पड़ताल में सामने आए चौंकाने वाले उदाहरण
पत्रिका की पड़ताल में कई ऐसे मामले सामने आए, जिन्होंने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिया। एक मामले में रामेश्वर (बदला हुआ नाम) की पर्ची पर केवल सीबीसी जांच लिखी गई थी, लेकिन लैब ने सीबीसी के साथ एचबीए1सी, बी-12 और थाइराइड जैसी अतिरिक्त जांचें कर दीं। इसी तरह 7 अप्रैल को मुकनाराम (बदला हुआ नाम) के लिए डॉक्टर ने केवल प्रोस्टेट जांच लिखी थी, जबकि लैब ने उसमें भी अतिरिक्त एचबीए1सी जांच जोड़ दी।
एक अन्य मामले में दिनेश ने एक ही दिन में दो डॉक्टरों से जांच करवाई। मात्र तीन घंटे के अंतराल में आई रिपोर्ट्स में हीमोग्लोबिन, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट्स के आंकड़ों में भारी अंतर पाया गया, जिससे रिपोर्ट की सटीकता पर सवाल खड़े हो गए।
लैब प्रबंधन ने दी सफाई
मामले के तूल पकड़ने पर लैब प्रबंधन ने इसे शुरुआती चरण की तकनीकी त्रुटि बताया है। टेक्नीकल ऑपरेशन मैनेजर दीपक बिशेन का कहना है कि कुछ ऑपरेटर नए हैं और उन्हें डॉक्टरों की लिखावट समझने में परेशानी हो रही है, जिसके कारण यह गड़बड़ियां हुई होंगी। उन्होंने दावा किया कि जल्द ही सुधार कर लिया जाएगा और डॉक्टरों से सीधे संपर्क कर ऐसी गलतियों को रोका जाएगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि सिस्टम में गंभीर खामी का संकेत हो सकता है।
प्रशासन ने कहा—ऑडिट में होगा खुलासा
जेएलएन अस्पताल के पीएमओ डॉ. आरके अग्रवाल ने बताया कि मदर लैब की मॉनिटरिंग के लिए विशेषज्ञों को निर्देश दिए गए हैं। यदि लैब संचालक द्वारा मनमर्जी से जांचें की जा रही हैं तो यह ऑडिट रिपोर्ट में सामने आ जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भुगतान केवल उन्हीं जांचों का किया जाएगा, जो डॉक्टर द्वारा लिखी गई हैं।
जनप्रतिनिधियों ने खोला मोर्चा
पत्रिका की खबरों के बाद अब यह मामला राजनीतिक रंग भी ले चुका है। नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल, कांग्रेस जिलाध्यक्ष हनुमान बांगड़ा और कांग्रेस नेता मनीष मिर्धा ने सोशल मीडिया पर इन खबरों को साझा करते हुए राज्य सरकार और चिकित्सा मंत्री से जवाब मांगा है।
मनीष मिर्धा ने आरोप लगाया कि ठेका कंपनी “एक जांच के बदले तीन जांच” कर रही है, जिससे सरकारी धन का दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने इसे जनता के टैक्स के पैसे की बर्बादी बताया। वहीं हनुमान बांगड़ा ने सवाल उठाया कि जब पूरा खर्च सरकार उठा रही है तो निगरानी की जिम्मेदारी किसकी है और ठेका प्रक्रिया किन आधारों पर तय की गई।
सांसद हनुमान बेनीवाल ने तो इस मुद्दे को और गंभीर बताते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को “वेंटिलेटरपर” बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि निजी लैब द्वारा बिना उचित जांच के रिपोर्ट जारी करने और स्वस्थ व्यक्तियों को बीमार बताने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं, जो लापरवाही के साथ-साथ आपराधिक श्रेणी में भी आ सकती हैं।
बेनीवाल ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य मंत्री के गृह जिले नागौर में ही चिकित्सा सेवाओं की स्थिति खराब है, जहां डॉक्टरों की कमी, खराब मशीनें और अव्यवस्थाएं साफ नजर आती हैं। साथ ही निजी लैब को ठेका देने से वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मियों की आजीविका पर भी संकट मंडरा रहा है।
निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग
जनप्रतिनिधियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, ठेका प्रक्रिया की समीक्षा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगी तो यह न केवल आर्थिक नुकसान का कारण बनेगा, बल्कि मरीजों की सेहत के साथ भी खिलवाड़ होगा।
अब सभी की नजरें सरकार पर टिकी हैं कि वह इन गंभीर आरोपों पर क्या कदम उठाती है और क्या स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए कोई ठोस निर्णय लेती है या नहीं।
Updated on:
11 Apr 2026 10:27 am
Published on:
11 Apr 2026 10:26 am
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