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मां दुनिया से विदा हुईं तो बेटे ने उनकी आंखों और शरीर को बना दिया दूसरों की जिंदगी की उम्मीद

नागौर में सुशीला देवी के निधन के बाद बेटे सुभाष ललवानी ने कराया नेत्रदान और देहदान, मेडिकल विद्यार्थियों की पढ़ाई से लेकर दृष्टिहीनों की जिंदगी में रोशनी लौटाने तक जुड़ी मां की अंतिम विदाई
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सुशीला देवी के निधन के बाद बेटे सुभाष ललवानी ने कराया नेत्रदान और देहदान

सुशीला देवी के निधन के बाद बेटे सुभाष ललवानी ने कराया नेत्रदान और देहदान

नागौर. मां के जाने के बाद घर में एक खालीपन रह जाता है। उनकी आवाज, उनका स्नेह और उनकी मौजूदगी यादों में सिमट जाती है, लेकिन नागौर के एक परिवार ने मां की विदाई को ऐसा अर्थ दिया कि उनके जाने के बाद भी कई जिंदगियों में उम्मीद का उजाला पहुंचने की संभावना बन गई। 79 वर्षीय सुशीला देवी ललवानी के निधन के बाद उनके बेटे सुभाष चंद ललवानी ने नेत्रदान और देहदान का निर्णय लिया। मां का पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित किया गया, वहीं नेत्रदान के जरिए जरूरतमंद लोगों को दृष्टि मिलने की उम्मीद जुड़ी है।

यह फैसला उस समय लिया गया, जब परिवार मातृशोक से गुजर रहा था। अपनों को खोने का दुख अपने आप में गहरा होता है, लेकिन इसी दुख के बीच सुभाष ललवानी और उनके परिवार ने ऐसा रास्ता चुना, जिससे मां की स्मृति केवल तस्वीरों और यादों तक सीमित नहीं रहेगी। उनका शरीर मेडिकल विद्यार्थियों के अध्ययन और चिकित्सा शिक्षा में काम आएगा। नेत्रदान किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में रोशनी लौटाने का माध्यम बन सकता है। एक परिवार की यह संवेदनशील पहल समाज के सामने सवाल भी रखती है—क्या मृत्यु के बाद भी हमारा शरीर किसी दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने में काम आ सकता है? सुशीला देवी का देहदान और नेत्रदान इसका जवाब है।

तीन महीने पहले लिया संकल्प, मां की विदाई पर भी निभाई भावना

इस निर्णय के पीछे अचानक उपजा विचार ही नहीं, बल्कि सेवा की भावना से जुड़ा एक पुराना संकल्प भी था। महावीर इंटरनेशनल नागौर के अध्यक्ष विमलचंदनाहटा और पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र संखलेचा के अनुसार, करीब तीन महीने पहले डॉक्टर डे पर आयोजित सम्मान समारोह में सुभाष चंद ललवानी देहदान और नेत्रदान के महत्व से प्रेरित हुए थे। कार्यक्रम में चिकित्सकों के साथ देहदान-नेत्रदान का संकल्प लेने वाली विभूतियों का सम्मान किया गया था। उसी दौरान सुभाष ललवानी ने अपनी पत्नी विजया ललवानी के साथ स्वयं देहदान का संकल्प पत्र भी भरा था। मां के निधन के बाद उन्होंने इसी सोच को व्यवहार में उतारा। परिवार ने पारंपरिक अंतिम संस्कार के बजाय पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। यह भावनात्मक रूप से कठिन घड़ी थी, लेकिन परिवार ने व्यक्तिगत दुख के साथ समाज के हित को भी महत्व दिया। सुभाष ललवानी के पिता चंचलमनललवानी भी सामाजिक और धार्मिक कार्यों से जुड़े रहे हैं। ऐसे में परिवार का यह निर्णय सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी की उसी परंपरा को आगे बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है।

मां की आंखों से किसी और के जीवन में लौट सकता है उजाला

देहदान के साथ नेत्रदान का निर्णय इस पहल का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष रहा। महावीर इंटरनेशनल के सदस्य पंकज नाहटा ने सुभाष ललवानी को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया। परिवार ने सहमति दी, जिसके बाद जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में डॉ. देवेंद्र शर्मा और उनकी टीम ने नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी करवाई। नेत्रदान के जरिए किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दृष्टि मिलने की संभावना उसके जीवन के साथ पूरे परिवार के लिए नई उम्मीद बन सकती है। जो आंखें एक मां के जीवन में दुनिया को देखती रहीं, उनके दान से किसी दूसरे व्यक्ति को दुनिया देखने का अवसर मिल सकता है। हालांकि नेत्रदान से दृष्टि मिलने की संभावना चिकित्सकीय जांच और प्रत्यारोपण की उपयुक्तता पर निर्भर करती है, लेकिन इस फैसले के पीछे भावना स्पष्ट है— जाने के बाद भी किसी के काम आना।

दो संस्थाओं की प्रेरणा, समाज के लिए संदेश

इस पहल में महावीर इंटरनेशनल नागौर और भारत विकास परिषद शाखा नागौर की प्रेरणा महत्वपूर्ण रही। भारत विकास परिषद के सचिव सुभाष ललवानी ने अपनी माताजी के देवलोकगमन के बाद यह निर्णय लेकर परिषद के रजत जयंती वर्ष में मानव सेवा के संकल्प को भी नई अर्थवत्ता दी है। दोनों संस्थाओं से जुड़े सदस्यों ने इसे देहदान और नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाला कदम बताया। इस अवसर पर प्रांतीय संरक्षक नृत्य गोपाल मित्तल, रामकिशोर सारडा, कैलाश, बजरंग लाल शर्मा, आनंद अग्रवाल, मनीष सुराणा, हरिराम धारणिया, संपत लुणावत सहित सामाजिक संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता, महावीर इंटरनेशनल के सदस्य और जैन समाज के नागरिक उपस्थित रहे। सुभाष ललवानी की इच्छा है कि इस तरह के कार्यों की जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, ताकि देहदान और नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़े। क्योंकि कई बार जानकारी और प्रेरणा के अभाव में लोग इस दिशा में कदम नहीं उठा पाते।

सुशीला देवी अब परिवार के बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विदाई ने सेवा का एक ऐसा संदेश छोड़ा है, जो घर की चौखट से निकलकर समाज तक पहुंच सकता है। मां की यादों को संजोने के अनेक तरीके होते हैं। इस परिवार ने उन्हें दूसरों के भविष्य और उम्मीद से जोड़ने का रास्ता चुना। एक मां का शरीर चिकित्सा विद्यार्थियों के लिए अध्ययन का माध्यम बनेगा और उनके नेत्र किसी जरूरतमंद के जीवन में रोशनी की उम्मीद जगाएंगे। यही इस कहानी का सबसे मानवीय पक्ष है— मां चली गईं, लेकिन परिवार के संस्कारों ने उनके जाने के बाद भी दूसरों की जिंदगी में उजाला छोड़ने की राह बना दी।