
Tajiya in nagaur
1 को निकलेगा ताजियों का जुलूस
पीढ़ी दर पीढ़ी लगी है ताजिए बनाने में
नागौर. वो अपने हुनर का मेहनताना नहीं लेते। वालिद/बुजुर्गों से जो कुछ सीखा यही उनकी पहचान में चार चांद लगाने के लिए काफी है। ताजिए चंद दिनों में नहीं बनते, महीनों लग जाते हैं। इन पर हुई नक्काशी की कला देखते ही बनती है। तकरीबन सप्ताह भर बाद 1 अक्टूबर को मोहर्रम मनाया जाएगा। नौ ताजिए बनाने का काम जोरों पर है। इस बार मोहर्रम पर मलेशिया की मस्जिद, मेड़ता की जामा मस्जिद का मीनार, मस्जिद ए नबवी, हरम शरीफ भी ताजिए में उबरे हुए नजर आएंगे। पत्रिका टीम ने शहर के विभिन्न मोहल्लों में जाकर ताजिए निर्माण की जानकारी ली। शहर में बाजरवाड़ा, न्यारों का मोहल्ला, बड़े पीर साहब की दरगाह, लोहारपुरा, डोडी की दरगाह, दड़ा मोहल्ला, कुम्हारी दरवाजा, पिजंरों का मोहल्ला, नकाश गेट में ताजियों का निर्माण किया जा रहा है। संवाददाता ने कारीगरों से बात की तो पता चला कि कोई चालीस साल तो कोई बीस साल से इस काम में जुटा हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहे इस हुनर में कोई ज्यादा बदलाव नहीं आया, हां ताजियों की कीमत व लंबाई में भी काफी बदलाव आ गया है। कोई मन्नत पूरी होने पर ताजिए का खर्चा उठाता है तो अधिकतर मोहल्ले वाले ही मिलकर बनवाते हैं। महीनों की हुनरमंदी का वो मेहनताना नहीं लेते।
तीन सौ रुपए में बनता था ताजिया
मोहम्मद निसार (70) तकरीबन 40 साल से ताजिए बना रहे हैं। नकाश गेट, घोसीवाड़ा निवासी मोहम्मद निसार ने बताया कि तकरीबन चालीस साल पहले ताजिए मामूली दाम में तैयार हो जाते थे। आज तो महंगाई के जमाने में बहुत पैसे लगते हैं, पहले सस्ताई थी। ताजिए की डिजाइनवे खुद बनाते हैं, जिसमें मोहल्ले वालों का पूरा सहयोग रहता है। उन्होंने ताजिए निर्माण की कला चढ़वा व हमाल कौम के कारीगरों से सीखी। ताजिए महंगे भले ही हो गए, लेकिन आज उनकी लंबाई घट गई। पहले जहां ये 24 फुट के थे, अब अब 14-16 फुट के रह गए हैं। वे रात में 8 से 10 बजे तक ताजिए का काम करते हैं। वे कहते हैं कि उनका ताजिया सादी डिजाइन का है। बांस, लकड़ी, रंग बिरंगे कागज, पतंग-पाना, रद्दी, आटे की लाई ही अधिकांश काम में आते हैं। उन्हें इसे बनाने में एक माह का समय आवश्यक लगता है। वे इसके बदले में मेहनताना कुछ भी नहीं लेते। ताजिया मोहल्ले वालों के खर्च से ही तैयार होता है। वो कहते हैं कि इसका भी क्या पैसा लेना?
कई पीढिय़ां गुजर गई...
गत 28 वर्षों से लोहारपुरा इलाके का ताजिया बना रहे मौला बख्श (58) ने बताया कि अब कलाकारी महीन हो गई। हूबहू किसी स्थल/मस्जिद/दरगाह/ को ताजिए में उबारने की कला वाकई काफी कठिन है। मौला बख्श का कहना है कि लोहारपुरा के ताजिये को तैयार करने में छह माह से ज्यादा का समय लगता है। पूर्व में ताजियों की लम्बाई 22 फूट होती थी अब15-18 फूट के होते है। उनके वालिद मोहम्मद बख्श, दादामोहम्मद उस्मान भी ताजिए बनाते थे। मैं खुश हूं कि यह काम पीढ़ी दर पीढ़ी किया जा रहा है। रोजी-रोटी के लिए ताजिए नहीं बनाते, वैसे वो प्लास बनाने का काम करते हैं।
पिता से सीखा अब पुत्र को सिखा रहे हैं...
गत 20 साल से डोडी पीर के ताजिए का निर्माण कर रहे मोहम्मद शब्बीर उर्फ मन्ना यूं तो किराने की दुकान चला रहे हैं। उनका कहना है कि ताजिए निर्माण की कला पिता मोहम्मद हुसैन से सीखी। उनके पिता ने अपनी जिंदगी के साठ सालतक ताजिए बनाए। उनके बनाए ताजिए में कम से कम तीन महीने लगते हैं। उन्होंने बताया कि हम रमजान की ईद के बाद कार्य शुरू कर देते हैं। ताजिए के निर्माण में सबसे जरूरी बात यह बारीक काम है, बड़ी तसल्ली से किया जाता है। खूबसूरत डिजाइन बनाने की खुशी ही उनका मेहनताना है। अब वे ताजिए बनाने का काम अपने 18 वर्षीय पुत्र अली अकबर को सिखा रहे हैं।
Updated on:
24 Sept 2017 11:59 am
Published on:
24 Sept 2017 11:31 am
बड़ी खबरें
View Allनागौर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
