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बोझ समझी जाने वाली बेटी अब परिवार की बनी लाडो, लिंगानुपात सुधार के टॉप टेन में नागौर

बेटियां पढ़ ही नहीं बढ़ भी रही हैं। विकास के पथ पर ही नहीं शिशु लिंगानुपात में भी। कुछ बरस पहले तक पैदा होने वाली कन्या को ' इग्नोर Ó करने वाले नागौर में अब इन पर गौर फरमाया जा रहा है।

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दस साल में बढ़ी बेटियां

शिक्षा से आई जागरूकता ने बदली नागौर की सूरत

एक्सपोज

नागौर. बेटियां पढ़ ही नहीं बढ़ भी रही हैं। विकास के पथ पर ही नहीं शिशु लिंगानुपात में भी। कुछ बरस पहले तक पैदा होने वाली कन्या को ' इग्नोर Ó करने वाले नागौर में अब इन पर गौर फरमाया जा रहा है। बोझ समझी जाने वाली बेटी अब परिवार की लाडो बन चुकी है। पिछले दस बरस में नागौर के शिशु लिंगानुपात में भारी सुधार हुआ है। इस दौरान 49 अंकों का बदलाव हुआ है। लिंगानुपात के हिसाब से नागौर (डीडवाना-कुचामन) प्रदेश में टॉप टेन जिलों में है।

सूत्रों के अनुसार बेटा जन्मते ही थाली बजने के साथ मिठाई बंटती थी तो बेटी के पैदा होते ही सन्नाटा छा जाता था। मां ही नहीं अन्य परिजन भी अपने नसीब को कोसते थे। बेटों की तरह नहीं पाली जाती थीं, हाशिए पर पटक दी जाती थीं। पढ़ाने के नाम पर सरकारी स्कूल इनके हिस्से आते थे तो दसवीं-बारहवीं से आगे की पढ़ाई गिने-चुने घर वाले ही करवाना पसंद करते थे। अपनों का ही पग-पग पर तिरस्कार झेलने वाली बेटी अब बराबरी के अधिकार पर इतरा रही है। हालांकि यह बदलाव कुछ पहले आया है पर इनके पैदा होने की संख्या में इजाफा दस साल में अच्छा हुआ है।

सूत्र बताते हैं कि बहू-बेटी के गर्भवती होते ही लड़का होगा या लड़की, इसका कयास बरसों से लगता आया है। विज्ञान बढ़ा तो सोनोग्राफी के जरिए गर्भ परीक्षण (लड़का होगा या लड़की) जैसे गैरकानूनी काम भी कुछ बरसों हुए। सरकार ने पाबंदी लगाई, तब जाकर इसमें कमी आई पर स्याणा/भोपा के यहां इसका अनुमान लेने सैकड़ों गर्भवती महिलाएं अब भी देखी जा रही हैं। यह भी सच है कि इनमें अधिकांश रूढ़ीवादी अथवा अनपढ़ भी होती हैं। शहरी अथवा पढ़ी-लिखी महिलाओं के साथ उनके परिवार वालों ने इन सब ढकोसलों को तिलांजली दे दी है।

ये भी हैं कारण

दस साल में लिंगानुपात में अच्छा खासा सुधार हुआ है। कोई बेटी बचाओ-बेटी पढाओ अभियान को इसका कारण बताता है तो कोई राज्य सरकार की योजनाओं का। बहरहाल इस सकारात्मक बदलाव में परिजनों की भूमिका भी कम नहीं है।

-समाज में बेटियों के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अब नागौर जिले में कई ऐसे परिवार हैं जहां केवल एक ही बच्चा है, वह भी लड़की। दम्पती अपनी इच्छा से दूसरा बच्चा पैदा नहीं करना चाहते।

- लड़कियों की प्रोग्रेस, उनका हर क्षेत्र में आगे आना भी इसका एक बढ़ा कारण है। न केवल नागौर के शहरी क्षेत्र में बल्कि यहां के ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियां पढ़-लिख रही हैं। नौकरीपेशा लड़कियों की संख्या बढ़ी है। पढ़ाई के साथ खेल-कूद में बालिकाएं नागौर का नाम कर रही हैं।

-बेटी को अब बेटे की तरह रखा जा रहा है। पढ़ाई-लिखाई के साथ उसकी आजादी, उसकी इच्छा के साथ उसको आगे बढ़ाने के हर संभव प्रयास परिजन करते हैं।

-बेटे की तरह बेटी का बर्थ-डे मनता है तो हर तीज-त्योहार के साथ हर कार्यक्रम में उसको प्राथमिकता दी जाती है।

घटे बाल-विवाह तो बढ़ी शादी की आयु

सूत्रों का कहना है कि शिक्षा के साथ बढ़ी जागरूकता ने बेटी को बेटे के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। पहले नागौर जिले में बेटियां चौदह-पंद्रह साल में शादी के बंधन में बांध दी जाती थीं। सरकार की पाबंदी के साथ लोगों की सक्रियता से भी बाल विवाह घटे। इसके साथ कॅरियर बनाने के चलते शादी की औसत आयु बढ़ी। कुछ बरस पहले तक युवकों की शादी भी बीस-बाइस साल की उम्र में हो जाती थी जो अब बढ़कर 27-28 हो गई। नौकरी की तैयारी या फिर पढ़ाई पूरी करने की लालसा ने भी शादी की उम्र बढ़ा दी।

इसलिए भी बेटियां बढ़ी

- डिकॉय ऑपरेशन : गर्भ परीक्षण के बाद लिंग जांच कर भ्रूण हत्या का दौर भी खूब चला। राज्य सरकार ने भ्रूण हत्या को रोकने के लिए वर्ष 2016 से अब तक खूब डिकॉय ऑपरेशन किए। इससे भ्रूण हत्या में तेजी से गिरावट आई और बेटियां पैदा हुईं।

-योजनाओं से भी हौसला: बेटियों के लिए बेटी जन्मोत्सव, राजश्री योजना, ब्रांड एंबेसेडर, बेटी बचाओ की शपथ, अपना बच्चा-अपना विद्यालय, बेटी के जन्म पर पौधरोपण सहित अनेक कार्यक्रम, बेटियों के भविष्य की सेविंग/शिक्षा सहित अन्य अवसरों की योजनाओं ने भी बेटियों की संख्या को बढ़ाया।

निकाल दी जाती थी घर से, अपशकुनी मानते थे...

इस संबंध में शिक्षिक चंदा मीना, संगीता सांगवा हो या शिक्षक मनीष पारीक या विक्रम सिंह। बुजुर्ग राम प्रताप, सगुनी, देवी सहाय, कैलाश राम सभी का कहना है कि कुछ समय पहले तक बेटी होने पर कई घर से बहू को निकालने जैसी प्रताडऩा सहनी पड़ती थी। बेटी जन्मते ही विवाहिता को अपशकुनी माना जाता था। बढ़ती शिक्षा के साथ सब मिलजुलकर प्रयास करने से यह हुआ।

इनका कहना

शिक्षा के साथ जागरूकता ने नागौर को इस मुकाम पर ला खड़ा किया है। कुछ बरस पहले तक अज्ञानता के साथ सामाजिक कुरीतियों से बंधे लोग अच्छा-बुरा समझ ही नहीं पाते थे। बढ़ती शिक्षा-जागरूकता ने लोगों को बेहतरी की राह दिखाई। बेटी को बेटों की तरह समझा जाने लगा।

-डॉ दीपिका व्यास, एमसीएच विंग (पुराना अस्पताल)

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पीसीपीएनडी एक्ट के तहत डिकॉय ऑपरेशन ने कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम लगाई। सरकार की बालिकाओं के हित में लाई गई योजनाओं ने भी लोगों को जागरूक किया। अब शहर हो या गांव, पढ़ी-लिखी कोई विवाहिता बेटे-बेटी में फर्क नहीं समझती। बेटियों को सम्मान मिलने लगा है, वो आगे बढ़ रही हैं। यह लिंगानुपात राज्य व देश के औसत से अधिक है।

-डॉ शैलेन्द्र लोमरोड, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ।