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VIDEO…इस शहर में भगवान नृसिंह को देखने देश के साथ विदेशों से भी पहुंचते हैं….

Nagaur. बंशीवाला मंदिर की घंटी के साथ ही नृसिंह भगवान की गर्जन से गूंजता रहा है नोपतखाना

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Nagaur news

To see Lord Narasimha in this city, people reach from the country as well as from abroad

नृसिंह जयंती पर रम्मत का इतिहास जुड़ा हुआ है नगरसेठ के मंदिर के साथ
आजादी के पहले भी नृसिंह भगवान की रम्मत से गूंजता रहा बंशीवाला मंदिर
नृसिंह भगवान की रम्मत के लिए संबंधित पात्र का चयन आज भी राजा साहब की ओर से ही किया जाता है
-गुरुवार को नृसिंह जयंती पर विशेष


नागौर. नृसिंह भगवान की जयंती गुरुवार को यानि की चार मई को मनाई जाएगी। इसी दिन नगरसेठ बंशीवाला मंदिर में भगवान नृसिंह की जयंती पर अर्चन के साथ ही परंपरानुसार रम्मत की जाएगी। बताते हैं कि नृसिंह जयंती पर रम्मत का प्रचलन उतना ही पुराना है, जितना यह बंशीवाला मंदिर। नृसिंह की रम्मत देखने के लिए केवल शहर एवं आसपास से ही नहीं, विदेशों से भी लोग आते हैं। रम्मत के दौरान यहां पर भीड़ नहीं, श्रद्धा का सैलाब उमड़ता है। बुजुर्गों की माने तो यह श्रद्धा का यह ज्वार भी केवल वर्तमान में ही नहीं, बल्कि सैंकड़ों सालों से चलता चला रहा है। नागौर में रहने वाला देश एवं विदेश के किसी भी हिस्से में हो, लेकिन वह नृसिंह भगवान की रम्मत देखने जरूर बंशीवाला मंदिर पहुंचता है।
राजा साहब करते हैं नृसिंह भगवान की रम्मत करने वाले का चयन
नृसिंह भगवान की रम्मत के साथ ही उनके मलूका को देखने के लिए इस बार भी बंशीवाला में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। इसकी तैयारियां शुरू कर दी गई है। भगवान विष्णु के अवतार में भगवान नृसिंह अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु का छठा अवतार नृसिंह अवतार के रूप में पूजित है। प्राचीन काल से चली आ रही इस परंपरा को आज भी जीवित रखने में नागौर के पुष्करणा समाज का अहम योगदान है। आज भी भगवान नृसिंह अवतार यानि की रम्मत के लिए चयन पुष्करणा समाज के व्यास राजा साहब की ओर से ही किया जाता है। वर्तमान में राजा साहब के पद पुखराज व्यास हैं। यह पिछले करीब पंद्रह वर्षों से चयन करते चले आ रहे हैं। बताते हैं कि अमरसिंह राठौड़ के प्रधान सेनापति गिरधर व्यास थे। इनको अमरसिंह राठौड़ ने ही राजा साहब की पदवी से नवाजा था। तभी इनका परिवार राजा साहब का प्रतिनितधित्व इसी पदवी के साथ करता चला आ रहा है।


सात्विकता के साथ ब्रह्मचर्य आवश्यक
इसके लिए वैशाख मास से अपना अनुष्ठान प्रारंभ करता है। राजा साहब श्रीमान पुखराज व्यास के छोटे भाई ठाकुर दत जी व्यास ने बताया कि जो व्यक्ति इस स्वरूप को धारण करता है। उसे वैशाख सुदी पूर्णिमा से व्रत ध्यान एवं ब्रह्मचर्य की पालना करना शुरू कर देता है। पुष्करणा समाज के इसी रम्मतत को सुचारू रूप से चलाने के लिए समाज के सभी वर्गों को कार्यभार दे रखा है। जैसे भगवान का कोलदा (कमरबंद) पकडऩे का कार्य है राज परिवार एवं झालर बजाने का कार्य है पुष्करणा समाज के मुथा परिवार करता है। इसके साथ ही अन्य पुष्करणा समाज के लोग अपने अलग-अलग जिम्मेदारियों को निभाते हैं।


30 बरस तक रम्मत की थी इन्होंने
बताते हैं कि नगरसेठ बंशीवाला में नृसिंह भगवान की सर्वाधिक बार रम्मत करने का रिकार्ड स्व. हरगोपाल जोशी के नाम रहा। बुजुर्गों की माने तो हरगोपाल जोशी ने वर्ष 1945 से यानि की आजादी के पूर्व से लगातार 30 बरस तक बंशीवाला में नृसिंह भगवान की रम्मत करते रहे। इसके बाद यह जिम्मेदारी जबरचंद व्यास, ललित आचार्य उर्फ लल्लू सा मगनलाल बोरा ने निभाई है। इनके बाद से अब तक ललित नारायण बोहरा, राकेश बोड़ा व केडी जोशी आदि निभाते चले आ रहे हैं। वर्तमान समय में नृसिंह भगवान की रम्मत करने वाले वाले ललित नारायण बोहरा ने बताया कि वैसे तो इसका कोई लिखित इतिहास या साक्ष्य काफी तलाशने पर भी नहीं मिला, लेकिन बुजुर्गों की जुबानी माने तो स्व. हरगोपाल जोशी 1945 से यानि की आजादी के तीस सालों तक रम्मत की, इसी तरह स्व. स्व. जब्बरचंद व्यास 1980 से से कई साल तक रम्मत की। इसके पश्चात ललित आचार्य ने 1990 से रम्मत शुरू की थी। इनके बाद वर्ष 2003 से ललित नारायण बोहरा अब तक नृसिंह भगवान की रम्मत करते चले आ रहे हैं।

कौन कर सकता है बंसी वाले मंदिर में भगवान नरसिंह की रमत
पुष्करणा समाज के राजा साहब यानि की पुखराज व्यास बताते हैं कि नागौर के माही दरवाजा के बाहर कल्याण देव जी का मंदिर है। इसे किशन बाग के नाम से जाना जाता है। नृसिंह की रम्मत बंशीवाला मंदिर में करने से पहले किशनबाग के इस मंदिर में रम्मत करना आवश्यक रहता है। दोपहर के भीषण गर्मी से शहर के मध्य भागों से होते हुए माही दरवाजा लोढ़ा का चोक,बंसीवाले का मंदिर,हाथी चौक, बाठडिया का चोक,मिश्रावाड़ी,लोहिया का चौक, वापस किशन बाग के नृसिह भृमण करता है। करीब यह 6 से 8 किलोमीटर के बीच का परिक्रमा पूरी कर लेता है तो ही वह व्यक्ति नगर सेठ बंसी वाले मंदिर में रमत करने योग्य माना जाता है। नृसिंह की रम्मत करने वालले को पूरे वैशाख माह में व्रत करने के साथ ही भगवान विष्णु का जप करना पड़ता है। पीपल वृक्ष आदि दिए जाने के साथ पूरी तरह से सात्विक रहना पड़ता है। बंशीवाला मंदिर के गर्भगृह में नृसिंह भगवान के अर्चन के साथ रम्मत शुरू होती है। इसके पश्चात नृसिंह भगवान रम्मत करते हुए नोपतखाना पहुंचते हैं। यहां से रम्मत करते हुए वापस गर्भगृह में दर्शन के साथ ही यह धार्मिक प्रक्रिया संपन्न हो जाती है।
पहले ऐसे बनता था मुखौटा
पुराने समय में नरसिंह का शुरू बनाने के लिए कागज की लुगदी को कूटकर उसमें गुड गूगल दाना मेथी को ग्राइंड करके बनाया जाता था लेकिन वर्तमान के कारीगर श्री श्यामसुंदर जी सोनी अपनी नई कला से कागज को परत दर परत चिपका कर स्वरूप का निर्माण करते हैं श्यामसुंदर जी सोनी कुछ केमिकल का इस्तेमाल करते हुए शुरू को मजबूती प्रदान करते हैं जिससे सीलन बारिश या नबी में स्वरूप को किसी प्रकार का कोई नुकसान ना हो। पेंटर श्याम सुंदर सोनी के नाम से ख्यात सोनी ने बताया कि वह पिछले 35-40 बरसों से नृसिंह भगवान का मुखौटा बनाते चले आ रहे हैं। इसके निर्माण के दौरान वह भी निर्धारित धार्मिक प्रावधानों का पूरा ध्यान रखते हैं।
बंशीवाला मंदिर में नृसिंह भगवान की रम्मत परंपरा मंदिर के स्थापना काल से ही चली आ रही है। यह रम्मत केवल मंदिर की नहीं, बल्कि जन आस्था का केन्द्र रहता है।
ललित आचार्य, श्रद्धालु
पिछले कुछ सालों से नृसिंह भगवान की रम्मत करने का सौभाग्य मिलता रहा है। इस वर्ष भी भगवान की रम्मत करने का सौभाग्य मिला है। रम्मत करने के लिए भी अपने समग्र स्वरूप के साथ ही मानसिक एवं शारीरिक पवित्रता को ध्यान में रखना पड़ता है। यह सौभाग्य हर किसी को नहीं मिल पाता है।
ललित बोहरा