
The color of Falgun come with Chang
नागौर. संगीत और फाग प्रेमियों के लिए होली से पूर्व का यह पखवाड़ा उल्लास और आनंद से सरोबार होता है। समवेत और उंचे स्वरों में चंग की थाप के साथ गाई जाने वाली होरियां सुनने के लिए रसिक पुरूष, महिलाएं फाग गाने वाले कलाकारों की टोलियों का इंतजार करते देखे जा सकते हैं। शहर के म्यूजिक स्टोर भी फाग की मस्ती में आकण्ठ डूबे नजर आ रहे हैं। वहीं स्टोर्स चंग, ढोल, नगाड़ों से सजे दिखाई दे रहे हैं। दिनभर इन दुकानों पर खरीदार पहुंचते हैं और अपनी पसंद के चंग आदि खरीदते देखे जा सकते हैं। भले ही मनोरंजन के साधनों की भरमार के चलते होरियों का दौर प्रभावित हुआ है, लेकिन जिन लोगों को फाग का रंग लगा है वो पूरे आनंद और उल्लास से इस त्योहार को मनाने की तैयारियां कर रहे हैं।
मिठास तो पशु चाम के चंग में है
सात पीढ़ी से इस व्यवसाय से जुड़े दुकानदार सुरेश चौहान ने बताया कि पहले भेड़, बकरे की खाल से बने चंग से होरियां का रंग जमता था। वर्तमान में फाइबर के चंग का प्रचलन शुरू हो गया। मजबूरन उनकी भी बिक्री करनी पड़ती है, जबकि होरियां, डाण्डिया आदि के लिए पशुओं की खाल से बने चंग, ढोल, नगाड़े आदि पुराने लोग ज्यादा पसंद करते थे। चौहान ने बताया कि इन वाद्यों में आम तथा रोहिड़े की लकड़ी काम में ली जाती है। कारीगरी से चंग को बिना जोड़ के बनाया जाता है। चंग की शुरुआती कीमत 200 रुपए है जो घेरे और लकड़ी के अनुसार तय की जाती है।
वो दौर और...
वरिष्ठ कलाकार मगनराज बोड़ा बताते हैं कि चंग से जो रंग जमते, वो लोगों के जेहन में आज भी सजीव है। अब होरियों की वो मस्ती मिलना मुश्किल है। नए कलाकारों का जुड़ाव धमाल और ऊंचे स्वरों की गायकी में कम हो गया है। एक दौर था जब कलाकारों की टोलियां बसंत पंचमी के बाद से ही फाग मस्ती में डूबी नजर आती थी, गलियों और नुक्कड़ों पर देखी जा सकती थी, लेकिन वर्तमान में वो दिवानगी कम हुई है। मनोरंजन के साधन बढऩे के साथ-साथ लोगों का रूझान भी परिवर्तित हुआ है।
Published on:
11 Mar 2019 12:10 pm
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