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शी पावर एक महिला जेल अफसर की सोच ने बदल दी कैदखाने की तस्वीर

हम बात कर रहे हैं एक ऐसी महिला अफसर की जिसने अपने नए प्रयोगों से बंदी गृह के नीरस, कुंठा और पश्चाताप से भरे माहौल को उमंग भरे वातावरण में बदलने का प्रयास किया है।

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shaifali tiwari

नरसिंहपुर. शासकीय नौकरी करना एक अलग बात है और एक लोक सेवक के रूप में अपने विभाग, समाज और देश के लिए कुछ नया करके दिखाना अलग बात है। नया काम वह जिसे सराहा जाए और जो एक नई राह दिखाए। यहां हम बात कर रहे हैं एक ऐसी महिला अफसर की जिसने अपने नए प्रयोगों से बंदी गृह के नीरस, कुंठा और पश्चाताप से भरे माहौल को उमंग भरे वातावरण में बदलने का प्रयास किया है। एक के बाद एक किए नए प्रयोगों ने दूसरे बंदीगृहों के अफसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दी। सेंट्रल जेल की अधीक्षक शेफाली तिवारी ने सतना जेल की अधीक्षक रहते वर्ष २०१४ में वहां जेल के भीतर जेल वाणी की शुरुआत की थी जिसमें कैदी ही रेडियो जॉकी होते हैं और वे खुद इसका संचालन करते हैं व फरमाइशी गीत भी सुनाए जाते हैं। उनका यह प्रयोग देश भर में सराहा गया जिसके बाद जेल विभाग के डीजी ने इसे अन्य जेलों में भी शुरू करने के निर्देश दिए। सतना से नरसिंहपुर स्थानांतरित होने पर शेफाली ने यहां भी २०१७ में जेल वाणी की शुरुआत की जिसे हाल ही में नया रूप देकर इसका विस्तार किया गया। २ घंटे के जेल वाणी कार्यक्रम के अंतर्गत न केवल फरमाइशी गीत संगीत का कार्यक्रम चलता है बल्कि हर दिन किसी नए विषय पर विचारों की अभिव्यक्ति का अवसर भी दिया जाता है। खास दिवस जैसे बालिका दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस या अन्य दिवसों के बारे में भी कैदियों को जानकारी दी जाती है। कैदियों को अच्छा बनने और अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाता है। केंद्रीय जेल नरसिंहपुर ेमेंं दोपहर २ से ४ बजे तक चलने वाले जेल वाणी कार्यक्रम की रूपरेखा उसी दिन तैयार कर ली जाती है। सुबह १० बजे तक कैदी अपनी फरमाइश की पर्चियां जमा कर देते हैं। जिसके बाद निर्धारित समय पर उनकी फरमाइश के अनुरूप गीतों का जेल की सभी २२ बैरक में प्रसारण किया जाता है।
होली पर कैदियों ने दीवारों को बनाया था कैनवास, उतारे थे जिंदगी के रंग
मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने....। यह फिल्मी गीत चरितार्थ हुआ था पिछले साल की होली पर । सेंट्रल जेल में बंदियों ने दीवारों को कैनवास बनाया, गीत गुनगुनाए अपने बीते कल को याद किया और सुनहरे सपनों को चित्रों के माध्यम से साकार किया। इस काम में अपना हुनर उन बंदियों ने भी दिखाया जो कल ही यहां आए थे और उन बंदियों ने भी जिनका लंबा जीवन इस जेल की ऊंची चहारदीवारों के भीतर गुजर गया।
जेल का जीवन ब्लैक एंड व्हाइट माना जाता है, यहां रहने वाले कैदियों के पश्चाताप, अपराधबोध और नैराश्य के रंग से भरे जीवन को सतरंगी बनाने के लिए जेल अधीक्षक शैफाली तिवारी ने एक अनूठी पहल की उन्होंने आर्ट ग्रुप इत्यादि फाउंडेशन को अपने यहां आमंत्रित किया और कैदियों के बेरंग जीवन को उत्साह और उमंग के रंगों से भरने को कहा। आर्ट फाउंडेशन के विनय अंबर, सचिव सुप्रिया अंबर ने जेलर, जेल के बंदियों के साथ मिल कर एक रंग कार्यशाला का आयोजन किया और जेल की दीवारों को रंगने के साथ ही सलाखों के बीच कैद बंदियों की भावनाओं के आसमान को रंग भरे सपनों के बादलों से आच्छादित कर दिया। रंगशाला में कैदियों के हाथ में रंग से भरी बाल्टियां थमा कर उनसे कहा कि अपनी पूरी ताकत से इन रंगों को गगन तक उछाल दें। हमेशा बंदिशों में जीने वाले बंदियों को जब रंगों से खेलने का मौका मिला तो उनका तन-मन खिल उठा। रंगों की बौछार ऐसी हुई कि देखते देखते जेल की दीवारें सतरंगी हो गईं। जिसके बाद आर्ट ग्रुप इत्यादि फाउंडेशन के विनय अंबर, सुप्रिया अंबर, प्रीति तिवारी, गुल पहराज, निहाल मिश्रा, रवींद्र तिवारी, सोबित जैन, भारती कुलस्ते केे साथ जेल के बंदी सतीश व अन्य ने रंगों की छाप को पेड़ पौधों व प्रकृति की अन्य खूबसूरत आकृतियोंं में बदल दिया। इस दौरान बंदी वीरू ने अपने जीवन को लेकर कविता सुनाई तो अन्य बंदियों ने चित्रों में रंग भरने में मदद की। जेल अधीक्षक ने भी चित्र बनाए । होली के अवसर पर आयोजित की गई इस रंग कार्यशाला ने बंदियों के जीवन को उत्साह से भर दिया। कैदियों ने कहा कि प्रायश्चित्त और अपराधबोध पर सुनहरे कल केे रंग चढ़ गए । जेल से बाहर जाने पर वे अपने जीवन के रंगों को शेष जीवन में साकार करने का प्रयास करेंगे।
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