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‘मासूमों का कत्लेआम, अस्पतालों तक को नहीं बख्शा’, अहमदाबाद ब्लास्ट केस में गुजरात HC ने क्यों बरकरार रखी 38 आतंकियों की फांसी?

Ahmedabad Blast Case: अहमदाबाद ब्लास्ट मामले में गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला। 38 आतंकियों की फांसी और 11 की उम्रकैद बरकरार। जानें पूरी खबर...
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अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में HC ने 38 दोषियों की मौत की सजा रखी बरकरार | फोटो सोर्स- (Photo-X @govindprataps12)

Ahmedabad Blast Case Update: गुजरात हाईकोर्ट ने 2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए इंडियन मुजाहिदीन (IM) के 38 दोषियों को दी गई फांसी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि यह एक बेहद सुनियोजित और व्यापक आतंकी साजिश थी, जिसका मकसद पूरे समाज में दहशत फैलाना और अधिकतम जनहानि करना था।

कोर्ट में जस्टिस एवाई कोगजे और जस्टिस समीर दवे की खंडपीठ ने सुनवाई की। पीठ ने 7 जुलाई को दिए अपने फैसले में 11 अन्य दोषियों को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को भी कायम रखा है।

कोर्ट ने माना कि इन दोषियों की गुजरात और केरल में आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से लेकर साजिश को अंजाम देने के लिए लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने तक की भूमिका साबित हुई है। फैसले की प्रति सोमवार को सार्वजनिक की गई।

70 मिनट में हुए थे 21 धमाके

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में महज 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। हमलावरों ने उन अस्पतालों को भी निशाना बनाया था, जहां घायलों का इलाज चल रहा था। यह भारत में पहली बार था जब किसी आतंकी हमले में अस्पतालों को भी लक्ष्य बनाया गया था।

दोषियों की सभी अपीलें खारिज

हाईकोर्ट ने सभी दोषियों की अपीलें खारिज करते हुए फरवरी 2022 में विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को सही ठहराया। विशेष अदालत ने इंडियन मुजाहिदीन के 38 आतंकियों को फांसी और 11 अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार ने भी फांसी की सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि 38 दोषियों के आपराधिक रिकॉर्ड, उनकी भूमिका और आतंकी साजिश में उनकी सक्रिय भागीदारी से स्पष्ट है कि उन्होंने ऐसा आतंकवादी कृत्य किया, जो 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि हमले की व्यापकता, बड़ी संख्या में हुई मौतें, आम जनता में भय का माहौल पैदा करने की मंशा और पूरी साजिश का स्वरूप फांसी की सजा को उचित ठहराता है।

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