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इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, रेल दुर्घटना में गर्भस्थ शिशु की मौत पर भी मिलेगा अलग मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि रेल दुर्घटना में गर्भवती महिला के साथ 5 महीने या अधिक उम्र के भ्रूण की मौत पर रेलवे को अलग मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने भ्रूण को व्यक्ति मानते हुए उसके अधिकारों को कानूनी मान्यता दी।

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भारत

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Anurag Animesh

Mar 21, 2026

Allahabad High Court Historic Verdict

Allahabad High Court Historic Verdict(AI Image-ChatGpt)

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील फैसला सुनाया है, जो भविष्य में रेल दुर्घटनाओं से जुड़े मुआवजा मामलों में मिसाल बन सकता है। इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी रेल दुर्घटना में गर्भवती महिला की मृत्यु होती है और उसके साथ गर्भ में पल रहे 5 महीने या उससे अधिक आयु के भ्रूण की भी मृत्यु हो जाती है, तो रेलवे को दोनों के लिए अलग-अलग मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने भ्रूण को केवल एक जैविक अवस्था नहीं, बल्कि एक “व्यक्ति” के रूप में मान्यता दी है, जो जन्म लेने वाला था और जिसकी मृत्यु एक स्वतंत्र दुर्घटना मानी जाएगी।

मृत्यु को नजरअंदाज करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ


अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अजन्मा बच्चा भी जीवन की संभावना रखता है और यदि दुर्घटना न होती, तो वह निश्चित रूप से जन्म लेता और जीवित रहता। इसलिए उसकी मृत्यु को नजरअंदाज करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। इस निर्णय के माध्यम से कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि कानून केवल जन्मे हुए व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अजन्मे जीवन की गरिमा और अधिकारों को भी स्वीकार करता है।

क्या है पूरा मामला?


यह मामला साल 2018 का है, जब बाराबंकी की रहने वाली भानमती नामक गर्भवती महिला मरुधर एक्सप्रेस में चढ़ने के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गईं। ट्रेन में चढ़ते समय उनका संतुलन बिगड़ गया और वे गिर पड़ीं, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं। अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उस समय वह लगभग 8 से 9 महीने की गर्भवती थीं और उनके गर्भ में पल रहे पुरुष भ्रूण की भी मौत हो गई। इस घटना के बाद मृतका के परिवार ने वर्ष 2019 में रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में मुआवजे के लिए याचिका दायर की। लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने वर्ष 2025 में फैसला सुनाते हुए भानमती की मृत्यु पर 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन भ्रूण की मृत्यु को अलग से मान्यता नहीं दी और उसके लिए कोई मुआवजा निर्धारित नहीं किया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


परिवार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गहन विचार-विमर्श किया और अंततः यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भ्रूण, विशेष रूप से 5 महीने या उससे अधिक आयु का, केवल शरीर का हिस्सा नहीं बल्कि एक संभावित जीवन है, जिसे कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।इस फैसले से न केवल पीड़ित परिवार को न्याय मिला है, बल्कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी स्थापित करता है। अब रेलवे और अन्य संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि दुर्घटनाओं में हुए हर प्रकार के नुकसान, चाहे वह अजन्मे जीवन का ही क्यों न हो, उसका उचित मूल्यांकन और मुआवजा दिया जाए।