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आज़ादी के समय खजाने में थे 375 करोड़, कुर्सियाँ और टाइपराइटर्स भी बांटने पड़े थे

भारत की अर्थव्यवस्था आज काफी बढ़ गई है, लेकिन शुरू में स्थिति बिल्कुल अलग थी। आइए जानते हैं आज़ादी के समय देश की स्थिति कैसी थी।
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भारत

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Tanay Mishra

Aug 15, 2026

Chairs and Typewriters

कुर्सियाँ और टाइपराइटर्स (Representational Photo)

जिस विशाल अर्थव्यवस्था पर आज देश को नाज़ है, उसकी शुरुआत बेहद सीमित संसाधनों से हुई थी। 15 अगस्त 1947 को जब देश आज़ाद हुआ, तब अविभाजित भारत (Undivided India) के रिज़र्व बैंक में करीब 375 करोड़ रुपए का नकद भंडार था। लेकिन कहानी सिर्फ खजाने की नहीं थी। नया देश बनते ही सरकारी दफ्तरों की मेज-कुर्सियाँ, अलमारियाँ और टाइपराइटर्सतक गिनकर बांटे गए। आज भारत की अर्थव्यवस्था करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर की है और केंद्र सरकार का 2026-27 का बजट 53.47 लाख करोड़ रुपए है। आज़ादी (Independence) के समय 375 करोड़ में से ही 75 करोड़ रुपए पाकिस्तान (Pakistan) को देने तय हुए थे।

महात्मा गांधी की इच्छा की गई पूरी

विभाजन के वित्तीय समझौते में पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपए 14 अगस्त 1947 को ही दे दिए गए थे। बाकी 55 करोड़ रुपए कश्मीर में चल रहे संघर्ष के बीच रोक दिए गए, लेकिन 15 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की इच्छा के बाद भारत सरकार ने 55 करोड़ रूपए के भुगतान का फैसला किया।

375 करोड़ उस समय कितने अहम थे?

आज के हिसाब से 375 करोड़ रुपए शायद उतनी बड़ी धनराशि न लगे, लेकिन 1947 की अर्थव्यवस्था में इसकी हैसियत अलग थी। आज़ाद भारत के पहले बजट में 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक केंद्र का राजस्व 171.15 करोड़ और राजस्व खर्च 197.39 करोड़ रुपए अनुमानित था। यानी 375 करोड़ का नकद भंडार उस दौर के करीब दो साल के अनुमानित केंद्रीय राजस्व खर्च के बराबर था।

रुपया तब कितना ताकतवर था?

1947 में भारतीय रुपया पाउंड से जुड़ा हुआ था। एक पाउंड करीब 13.33 रुपए और एक डॉलर करीब 3.30 रुपए का था। 375 करोड़ रुपए उस समय की विनिमय दर से करीब 11.4 करोड़ डॉलर के बराबर थे।

कुर्सियाँ और टाइपराइटर्स भी बांटने पड़े थे

यहीं विभाजन का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। देश और संपत्ति के बंटवारे के साथ सरकार चलाने का सामान भी दो हिस्सों में बांटना पड़ा। दफ्तरों के लिए फर्नीचर, मशीनरी और स्टेशनरी की बाकायदा सूचियाँ तैयार हुईं। अविभाजित भारत के विदेश मामलों और कॉमनवेल्थ रिलेशंस विभाग में 203 टाइपराइटर्स थे। आकलन हुआ कि विभाजन के बाद दिल्ली के काम के लिए 182 टाइपराइटर्स पर्याप्त होंगे, बाकी पाकिस्तान भेजे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, ज़रूरत की सूची में 31 पेन स्टैंड, 125 कागज रखने की अलमारियाँ, 16 आसान कुर्सियाँ, 31 अधिकारियों की मेज और 20 चपरासी बेंच तक दर्ज थीं। यानी एक तरफ आज़ादी का जश्न था, दूसरी तरफ सरकारी दफ्तर में यह तय हो रहा था कि कितनी कुर्सियाँ और कितने टाइपराइटर्स किस देश के हिस्से जाएंगे।