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Chandra Shekhar Azad death anniversary: आजाद की पिस्‍टल ‘बमतुल बुखारा’ से घबराते थे अंग्रेज

चंद्रशेखर आजाद बचपन में आदिवासियों के बीच रह कर धनुषबाण चलना सीखा और निशानेबाजी में निपुण हो गए। आजाद पेड़ों की आड़ से लक्ष्य कर गोली चलाते थे। पिस्टल से धुआं न निकलने से अंग्रेज अफसर और सिपाही नहीं जान पाते थे कि वह कब किस पेड़ के पीछे हैं। आजाद ने अपनी इस पिस्टल को बमतुल बुखारा नाम दिया था।

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chandra shekhar azad

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Chandra Shekhar Azad death anniversary: भारत के महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी चंद्र शेखर आजाद की आज 116वीं जयंती मनाई जा रही है। उनका जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ स्थित भाबरा गांव में एक सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी था जो एक प्रकांड पंडित थे और उनकी माता जगरानी देवी एक गृहिणी थीं। बचपन में आदिवासियों के बीच रह कर आजाद ने धनुषबाण चलना सीखा और निशानेबाजी में निपुण हो गए। आजाद की पिस्टल से फायर होने के बाद धुंआ नहीं निकलता था। इसकी वजह से अंग्रेज पेड़ों के पीछे से पता नहीं लगा पाते थे कि गोली कहां से चली। आइए जानते है उनकी बमतुल बुखारा के बारे में।

1903 में अमेरिकी कंपनी ने बनाई थी पिस्टल
पिस्टल को अमेरिकन फायर आर्म बनाने वाली कोल्ट्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी ने 1903 में बनाई थी। जो अब कोल्ट पेटेंट फायर आर्म्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी के नाम से जानी जाती है। प्वाइंट 32 बोर की पिस्टल हैमरलेस सेमी आटोमैटिक थी। इसमें आठ बुलेट की एक मैंग्जीन लगती थी। गोली चलने के बाद इससे धुआं नहीं निकलता है जिससे शहीद चंद्रशेखर आजाद को अंग्रेजों से मोर्चा लेने में सुविधा हुई थी।

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बमतुल बुखारा से नहीं न‍िकलता था धुआं, चकमा खा जाते थे अंग्रेज
आजाद पेड़ों की आड़ से लक्ष्य कर गोली चलाते थे। पिस्टल से धुआं न निकलने से अंग्रेज अफसर और सिपाही नहीं जान पाते थे कि वह कब किस पेड़ के पीछे हैं। आजाद ने अपनी इस पिस्टल को बमतुल बुखारा नाम दिया था। 1976 में लखनऊ से प्रयागराज संग्रहालय में ले जाकर रखा गया।

कभी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं लगने का लिया था प्रण
भारत मां के वीर सपूत चंद्र शेखर आजाद के मन में छोटी सी उम्र से ही ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों और उनकी क्रूरता के खिलाफ विद्रोह की भावना जागने लगी थी। उन्होंने साल 1921 में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया, उस दौरान उनकी उम्र महज 15 साल थी। आजादी के इस क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी ने यह प्रण लिया था कि वे कभी भी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं लगेंगे।