
चंद्रयान-3 का प्रज्ञान रोवर (File Photo)
विश्व के सबसे सफल चंद्र मिशनों में से एक भारत (India) के चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) के रोवर प्रज्ञान (Prgyan) की रिसर्च सेे चांद की सबसे प्राचीन सतह के निर्माण की प्रक्रिया समझने के रास्ते खुल गए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास की गुत्थी सुलझाने में भी मददगार साबित हो सकता है। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास शिव शक्ति पॉइंट पर उतरा था। इसके बाद प्रज्ञान रोवर ने लगभग 100 मीटर की दूरी तय करते हुए अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर (एपीएक्सएस) की सहायता से मिट्टी की रासायनिक संरचना की रिसर्च की और नए राज़ खोले।
भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल), अहमदाबाद के वैज्ञानिकों ने रिसर्च के आधार पर सामने आए आंकड़ों का विश्लेषण कर पाया कि चांद पर शिव शक्ति पॉइंट की मिट्टी की रासायनिक संरचना एएलएचए 81005 नामक चंद्र उल्कापिंड से सबसे ज़्यादा मेल खाती है। यह चंद्रमा से प्राप्त पहला प्रमाणित उल्कापिंड है, जिसे 1981-82 में अंटार्कटिका के एलन हिल्स क्षेत्र से खोजा गया था। वैज्ञानिकों ने धरती के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त 66 अन्य चंद्र उल्कापिंडों की तुलना चंद्रयान-3 के आंकड़ों से की, लेकिन शिवशक्ति पॉइंट की मिट्टी की संरचना सबसे अधिक एएलएचए 81005 से मेल खा रही थी।
चांद की मिट्टी की रिसर्च में पाया गया कि इसमें एल्युमिनियम की मात्रा कम है। वहीँ यह भी पता चला कि इस मिट्टी में लोहे और मैग्नीशियम की मात्रा ज़्यादा है। साथ ही ओलिवीन और पाइरॉक्सीन जैसे खनिज भी सामान्य चंद्र उच्चभूमि की तुलना में ज़्यादा पाए गए।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मिट्टी चंद्रमा की ऊपरी और गहरी परतों के पदार्थों का मिश्रण है। रिसर्च से संकेत मिलता है कि लगभग 4.3 बिलियन साल पहले बने साउथ पोल–एटकैन (एसपीए) बेसिन के प्रभाव से गहराई की प्राचीन सामग्री सतह पर आई होगी। इस तरह से चंद्रयान-3 का लैंडिंग स्थल चंद्रमा के आदिम इतिहास और उसकी संरचना को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे चांद के बारे में नई जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी।
Updated on:
04 Jul 2026 11:52 pm
Published on:
04 Jul 2026 11:46 pm
