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कांग्रेस अध्यक्ष के पास एक कमी से कांग्रेसी चिंतित, सोनिया गांधी के बाद से खत्म है यह व्यवस्था

कांग्रेस में बढ़ते केंद्रीकरण और कमजोर सलाहकार तंत्र को लेकर आंतरिक असंतोष, संगठन और चुनावी रणनीति पर असर डालता नजर आ रहा है।

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भारत

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Himadri Joshi

Apr 06, 2026

Congress National President Mallikarjun Kharge and Rahul Gandhi

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी(File Photo- Patrika)

कांग्रेस में सीमित दायरे में फैसले लेने की शैली अब संगठन और चुनावी प्रदर्शन दोनों पर असर डालती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हो रही है कि कमजोर सलाहकार तंत्र और बढ़ते केंद्रीकरण ने निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित किया है। दरअसल, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में संगठनात्मक ढांचे को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। पिछला साल संगठन सृजन के नाम रहा, पर राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय और जातीय असंतुलन के आरोप भी सामने आए हैं। खरगे खुद कर्नाटक से आते हैं, जबकि संगठन महासचिव का अहम पद के.सी. वेणुगोपाल के पास है, जो केरल से हैं। इसके अलावा कई नेता वर्षों से महासचिव जैसे पदों पर बने हुए हैं, जिससे नए संतुलन की गुंजाइश सीमित दिखती है।

अध्यक्ष के पास सलाहाकर का अभाव

पार्टी के अंदर माना जा रहा है कि इन कमियों को दूर न कर पाने की एक बड़ी वजह शीर्ष स्तर पर राजनीतिक सलाहकार का अभाव है। सोनिया गांधी के कार्यकाल तक अहमद पटेल और अंबिका सोनी जैसे नेता राजनीतिक सलाहकार की भूमिका में थे, जो संगठन के निचले स्तर तक संवाद बनाए रखते थे और फीडबैक नेतृत्व तक पहुंचाते थे। वर्तमान में अध्यक्ष के पास ऐसा कोई औपचारिक सलाहकार नहीं है। वहीं, राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले वेणुगोपाल संगठन में सक्रिय जरूर हैं, पर पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि उनका जमीनी स्तर पर संवाद सीमित है। सूत्रों के मुताबिक, हाल के समय में कई अहम फैसलों में अध्यक्ष की तुलना में वेणुगोपाल की भूमिका प्रमुख दिखी है।

चर्चा होती है, पर फैसले सीमित दायरे में

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि बड़े मुद्दों पर चर्चा जरूर होती है, पर निर्णय प्रक्रिया अब सीमित नेताओं तक सिमटती दिख रही है। इसका असर टिकट वितरण, गठबंधन रणनीति और चुनावी अभियान जैसे अहम पहलुओं पर पड़ा है। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि कभी-कभी फैसलों का केंद्रीकरण जरूरी हो जाता है और चुनावी नतीजों को केवल संगठनात्मक ढांचे से जोड़कर देखना पूरी तस्वीर नहीं है।

पार्टी छोड़ने वाले नेता भी उठा चुके हैं सवाल

कांग्रेस छोड़कर अन्य दलों में जाने वाले कई नेताओं ने भी आरोप लगाया है कि पार्टी में उनकी बात नहीं सुनी गई। कुछ मामलों में निर्णय प्रक्रिया पर सीमित समूह और निजी स्टाफ के प्रभाव के आरोप भी सामने आए हैं। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर का कहना है कि मजबूत सलाहकार तंत्र ही कार्यकर्ताओं का फीडबैक नेतृत्व तक पहुंचाता है। राजीव गांधी, पी.वी. नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी के दौर में यह व्यवस्था सक्रिय थी। उनका मानना है कि राहुल गांधी का जनाधार बढ़ रहा है, लेकिन उनके पास ऐसा सलाहकार तंत्र नहीं है जो राजनीतिक फीडबैक को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ा सके। अख्तर के मुताबिक, फसल तैयार हो रही है, पर कटाई करने वाला तंत्र कमजोर है। उनका सुझाव है कि अगर कांग्रेस को चुनावी स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करना है, तो नेतृत्व को संगठन के निचले स्तर तक संवाद मजबूत करना होगा और टीम के भीतर जिम्मेदारियां स्पष्ट करनी होंगी।