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Delhi Air Quality: दिल्ली में फेफड़ों पर प्रदूषण का बढ़ता बोझ और मीर तकी मीर के 250 वर्ष पुराने सवाल का जवाब ढूंढने में बेबस सरकारें

Delhi NCR AQI: दिल्ली और एनसीआर में वायु प्रदूषण का मसला कोई नया नहीं है। इस सवाल से जूझते हुए कई दशक बीत चुके हैं लेकिन किसी भी सरकार के पास इस गैस चैंबर को तोड़ने का कोई ठोस इलाज नहीं है।

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मीर तकी मीर ने 250 वर्ष पहले ही दिल्ली के बारे में पूछ लिया था- देख तो दिल के जां से उठता है, ये धुआं कहां-कहां से उठता है... गजलगो ने गजल का यह मतला तो किसी और संदर्भ में लिखा होगा लेकिन सच तो यह है कि दिल्ली वाले हर साल सर्दियों के शुरू होने से इस सवाल से जूझते नजर आते हैं। इस सवाल से ना सिर्फ दिल्ली और मुंबई के लोग जूझ रहे हैं बल्कि यही हाल छोटे और बड़े कमोबेश सारे शहरों और कस्बों का हो गया है। इस सवाल का जवाब भले ही हमें ना मिल रहा हो लेकिन यह हमारी उम्र जरूर कम कर रहा है। दिल्ली एनसीआर में बहने वाली जहरीली हवा बच्चों के फेफड़ों को कमजोर कर रही है। हर तीसरे बच्चे का फेफड़ा प्रदूषण की वजह से कमजोर हो रहा है। वहीं दूसरी ओर हर उम्र के श्वांस संबंधी मरीजों की हालत खराब कर रहा है।

बढ़ रहा है हार्ट अटैक का खतरा

दिल्ली और एनसीआर में हवा की गुणवत्ता 'गंभीर' श्रेणी की हर हदों को पार कर चुकी है। अब आलम यह है कि दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर्स लोगों को सुबह-सुबह पार्क में वॉक या एक्सरसाइज करने जाने से मना कर रहे हैं। मास्क के बगैर बाहर निकलने से मना कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जिन मरीजों को डॉक्टर पर्चे पर मॉर्निंग वॉक चेतावनी के बतौर लिखकर दे रहे हैं, वे क्या करें? पिछले तीन दशक में वैश्विक तौर पर दिल की बीमारियों के खतरा 31 फीसदी तक बढ़ गया है। वैज्ञानिकों ने 35 अलग-अलग अध्ययनों को रिव्यू करने पर पाया कि हवा में PM2.5 में 10 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर का स्तर बढ़ने पर हार्ट अटैक का खतरा 2.1 फीसदी तक बढ़ जाता है।

तीन दिनों से आसमान पर धुंध की चादर

गौरतलब है कि दिल्ली और एनसीआर में पिछले तीन दिनों से धुंध की चादर सी छायी हुई है। दिल्ली में स्मॉग के चलते बच्चों के स्कूलों की छुट्टी की घोषणा हो चुकी है। हर साल रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ कैंपेन और ऑड-ईवन स्कीम चलाए जा रहे हैं। कृत्रिम बारिश करवाकर आसमान में छाए प्रदूषण के स्तर को कम करने की कोशिश भी प्रदूषण कम करने की समस्या का उचित निदान नहीं बन पाता। ऐसे हालात में बीमार लोगों की हालत जरूर पहले के मुकाबले ज्यादा खराब होती जा रही है। दिल्ली के अस्पतालों में खांसी, गले में संक्रमण, आंखों में जलन और नाक बहने की समस्या वाले रोगी बड़ी संख्या में अस्पताल और डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं। श्वांस रोग विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण के कारण आस्था के मरीज की हालत बहुत ज्यादा खराब हो रही है। उनका कहना है कि प्रदूषण के चलते हर उम्र के लोगों की सेहत पर बेहद नकारात्मक असर पड़ रहा है।

अगले दो हफ्तों तक प्रदूषण से नहीं मिलेगा निजात

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं के चलते दिल्ली और एनसीआर में हर साल वायु प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंचने की घटना आम सी बात हो चुकी है। यह बताया जा रहा है कि अगले दो हफ्तों तक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी। दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र के कई इलाकों में एक्यूआई 400 के स्तर को पार कर चुका है। दरअसल में वायु प्रदूषण की समस्या एक, दो या तीन साल पुरानी नहीं है। अब यह कई दशक पुरानी बात हो चली है। ऐसे में अब यह हो रहा है कि खांसी, गले में संक्रमण, आंखों में जलन, जुखाम आदि के मामले अनावश्यक रूप से बहुत लंबा खींच जा रहे हैं। सवाल यह है कि प्रदूषण की समस्या का आम जनता के पास कोई इलाज नहीं है। इसका इलाज तो सरकारों के पास ही है लेकिन सरकार मूल समस्या के बारे में नहीं सोच रही है। दिल्ली जैसे शहरों में वाहनों की संख्या पहले ही बहुत ज्यादा हैं लेकिन इसके बावजूद वहां सड़कों पर वाहनों का बोझ करने की कोई योजना सरकारों के पास नहीं है। ऐसे में हर साल प्रदूषण के स्तर बढ़ने का रोना रोने के अलावा हम कुछ और नहीं कर सकते।

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