
दिल्ली हाई कोर्ट (सोर्स: विकिपीडिया)
Delhi High Court on Women rights: दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बेरोजगार पत्नी को बेकार, खाली या निठल्ला मानकर उसके श्रम को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने भरण-पोषण आवेदन पर सुनवाई करते हुए कहा कि गृहिणी या 'होममेकर' का श्रम कमाने वाले जीवनसाथी को प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम बनाता है, इसलिए उसकी बेरोजगारी को आलस्य के बराबर मानना अन्यायपूर्ण है।
अदालत ने कहा कि जो महिलाएं काम करने में सक्षम और इच्छुक हैं, उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन केवल इस आधार पर भरण-पोषण से वंचित करना कि वह कमा सकती है, त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण है। कानून को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परिवार निर्माण में समय, श्रम और वर्षों का निवेश करने वाला जीवनसाथी आर्थिक रूप से असहाय न रह जाए। न्यायालय ने कहा कि घरेलू कार्य, बच्चों की देखभाल और परिवार के समर्थन का भी आर्थिक मूल्य है, भले ही वह आयकर या बैंक विवरण में दर्ज न हो।
हाई कोर्ट 16 फरवरी के आदेश में मजिस्ट्रेट अदालत के उस फैसले पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें महिला को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था। निचली अदालत ने उसे सक्षम और शिक्षित बताते हुए रोजगार न तलाशने को आधार बनाया था। हाई कोर्ट ने कहा कि गैर-रोजगार को जानबूझकर निर्भरता या निष्क्रियता मानना घरेलू योगदान की गलत समझ दर्शाता है और ऐसा दृष्टिकोण अवास्तविक व अन्यायपूर्ण है।
Published on:
27 Feb 2026 06:29 am
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