
सुप्रीम कोर्ट में खुली आर्केस्ट्रा की काली हकीकत (X Photo)
Spa Center Crime: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक एनजीओ की याचिका (NGO Petition) पर सुनवाई के दौरान बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और राजस्थान के मसाज पार्लरों में नाबालिग लड़कियों से जबरन काम कराने, उनके यौन शोषण और तस्करी के मामलों को गंभीर बताया।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा है कि अब तक लड़कियों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और विपुल एम पंचोली की पीठ को बताया कि '10 से 16 साल की लड़कियों को माता-पिता का कर्ज चुकाने के लिए ऑर्केस्ट्रा, स्पा और मसाज पार्लरों में जबरन काम कराया जाता है।'
एनजीओ 'जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस' की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट एच एस फुल्का ने कोर्ट से कहा कि बाल श्रम कानून (Child and Adolescent Labour Act, 1986) की अवहेलना की जा रही है। फूलका ने कहा कि 'कानून से बचने के लिए, कई क्षेत्र में ऑर्केस्ट्रा, डांस बार, नौटंकी प्रदर्शन, मसाज पार्लर, स्पा और सैलून, जो खतरनाक श्रेणी में सूचीबद्ध नहीं हैं ये कई सालों से बाल तस्करी, यौन शोषण और दुर्व्यवहार के संगठित उद्योगों में तब्दील हो गए हैं।' जिसके बाद पीठ ने एनसीपीआर और एनएचआरसी को भी नोटिस जारी किए।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकारों, NCPCR (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) और NHRC (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) को नोटिस जारी कर कड़ा जवाब मांगा है।
एनजीओ ने कहा कि गरीब, आदिवासी और प्रवासी परिवारों की 10 से 16 साल की बच्चियों को पहले निशाना बनाया जाता है। उन्हें नौकरी, ग्लैमर की दुनिया, डांस ट्रेनिंग या फिर शादी का झांसा देकर फंसाया जाता है। कई मामलों में तो लाचार मां-बाप का कर्ज चुकाने के लिए इन बच्चियों को महज कुछ रुपयों में सौदागरों के हवाले कर दिया जाता है। वहीं, कोर्ट में दाखिल याचिका के मुताबिक, पिछले साल मार्च से दिसंबर के बीच ही सिर्फ बिहार और पश्चिम बंगाल के आर्केस्ट्रा और नौटंकी ग्रुप्स से 200 से ज्यादा नाबालिग बच्चियों को रेस्क्यू कराया गया है। इसके अलावा दिल्ली और राजस्थान के मसाज पार्लर्स से भी दर्जनों लड़कियां छुड़ाई गई हैं।
एक समय था जब आर्केस्ट्रा और नौटंकी को शादियों या सामाजिक कार्यक्रमों में पारंपरिक मनोरंजन का साधन माना जाता था। लेकिन अब इसकी आड़ में एक संगठित क्रिमिनल नेटवर्क फल-फूल रहा है। इन बच्चियों को जानवरों की तरह ठूस-ठूस कर रखा जाता है, न पढ़ाई की आजादी है और न ही कहीं आने-जाने की छूट।
दरअसल, स्पा, सैलून, आर्केस्ट्रा और डांस बार जैसी इंडस्ट्री 'खतरनाक उद्योगों' की लिस्ट में शामिल नहीं हैं। इसी कानूनी कमी का फायदा उठाकर ये अपराधी बिना किसी डर के मासूमों की जिंदगी से खेल रहे हैं। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद सरकारें इन मासूमों को बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाती हैं।
Updated on:
26 May 2026 04:20 pm
Published on:
26 May 2026 04:20 pm
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