20 मई 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकीलों को 30% आरक्षण और बराबर के केस देने की मांग पर केंद्र सरकार को नोटिस दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकारी कानूनी पैनलों में महिला वकीलों को 30 फीसदी आरक्षण देने की मांग पर केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर दिया है।

3 min read
Google source verification

भारत

image

Ankit Sai

May 20, 2026

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (ANI)

Women Lawyers Reservation: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय न्याय व्यवस्था में महिलाओं की कम हिस्सेदारी पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। 'लाडली फाउंडेशन ट्रस्ट' (Ladli Foundation Trust) की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्य कांत की बेंच ने सरकारी कानूनी पैनलों में महिला वकीलों को 30% आरक्षण देने पर जवाब मांगा है। अदालत में पेश आंकड़ों के मुताबिक, देश के 15.4 लाख वकीलों में महिलाएं सिर्फ 15.31% हैं। वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा कि महिलाओं को पैनल में रखने के बाद भी केस नहीं सौंपे जाते। याचिका में सामने आया कि आजादी के बाद से आज तक देश में एक भी महिला अटॉर्नी जनरल नहीं बनी है।

महिला वकीलों के साथ भेदभाव

यह पूरा मामला अदालतों के भीतर महिलाओं की दयनीय स्थिति को बयां करता है। देश को आजादी मिले इतने साल हो गए, लेकिन आज भी सरकारी वकीलों की लिस्ट में महिलाओं का नाम ढूंढने से भी नहीं मिलता। इसी गंभीर भेदभाव को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की बेंच ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस मामले में पूरी रिपोर्ट और डेटा पेश करने को कहा है।

सरकारी पैनलों का कड़वा सच आया सामने

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के एक हालिया सर्वे का हवाला देते हुए वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अदालत के सामने देश की महिला वकीलों का दर्द रखा। उन्होंने बताया कि महिला वकीलों के साथ दोहरे स्तर पर भेदभाव होता है। विकास सिंह ने अदालत से कहा कि सरकारी पैनलों में महिला वकीलों को शामिल करना ही काफी नहीं था, क्योंकि अक्सर उन्हें कोई केस नहीं सौंपा जाता था। वहीं, उन्होंने तीन जजों की बेंच से पुरजोर मांग की कि सिर्फ कागजों पर आरक्षण देना काफी नहीं होगा, बल्कि एक ऐसा परमानेंट सिस्टम बनाना होगा जो महिला अधिवक्ताओं को असलियत में केस मिलने की गारंटी दे सके।

देश में आज तक एक भी महिला अटॉर्नी जनरल नहीं बनी

अब सवाल उठता है कि आखिर महिला वकीलों के साथ कोर्ट रूम में क्या खेल चल रहा है? याचिका में जो आंकड़े पेश किए गए हैं, वे किसी को भी हैरान करने वाले है।

  • पूरे देश में लगभग 1.54 मिलियन (15.4 लाख) वकील रजिस्टर्ड हैं।
  • महिला वकीलों की संख्या इनमें से सिर्फ 2,84,507 महिला वकील हैं, जो कुल कार्यबल का महज 15.31% हैं।
  • उच्च न्यायपालिका का हाल साल 1989 में जस्टिस फातिमा बीवी के देश की पहली महिला जज बनने के बाद से आज तक सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 11 महिला जजों की नियुक्ति हो सकी है।

याचिका में सबसे बड़ा और कड़वा खुलासा यह किया गया कि आजादी के बाद से आज तक भारत में कोई भी महिला अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल के पद तक नहीं पहुंच पाई है। यहां तक कि हाई कोर्ट्स के लिए नामित एडिशनल सॉलिसिटर जनरल में भी एक भी महिला नहीं है।

मौलिक अधिकारों के लिए बड़ी कानूनी जंग

इसी लैंगिक असमानता को खत्म करने के लिए इस पीआईएल में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3), 19(1)(g) और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है। याचिका में साफ कहा गया है कि देश के सभी हाई कोर्ट पैनलों, सरकारी विधि अधिकारी पदों और केंद्र व राज्य सरकार के पीएसयू (PSU) के लीगल पैनलों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 फीसदी सीटें रिजर्व की जाएं। लॉ कॉलेजों से लड़कियां भारी संख्या में पढ़ लिखकर निकल तो रही हैं, लेकिन जब करियर में आगे बढ़ने और अथॉरिटी वाले पदों पर बैठने की बात आती है, तो उन्हें पीछे धकेल दिया जाता है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद सरकारों में खलबली मच गई है।