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बच्चे की आंखों का रंग, लंबाई और बुद्धिमत्ता भी होगी तय? नई Gene Editing तकनीक चर्चा में

Gene Editing: नई Base Editing तकनीक ने जन्म से पहले आनुवांशिक बीमारियों को ठीक करने की उम्मीद जगाई है। जानिए Designer Baby क्या है, CRISPR और Gene Editing कैसे काम करती है, इसके संभावित फायदे, बड़े जोखिम, नैतिक सवाल और भारत समेत दुनिया में इससे जुड़े मौजूदा नियम।
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भारत

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Anurag Animesh

Jun 29, 2026

Gene Editing details

AI Image-ChatGpt

Designer Baby: हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका होने वाला बच्चा स्वस्थ, सुंदर और बुद्धिमान हो। लेकिन शिशु के जन्म से पहले डॉक्टर आपसे पूछे कि बच्चे की आंखों का रंग कैसा रखना है, लंबाई और बुद्धिमत्ता कितनी हो? इतना ही नहीं बच्चा दिल की बीमारी, डायबिटीज या कैंसर जैसे खतरों से भी मुक्त रहे। तो एक आम परिवार के लिए यह किसी जादुई सपने जैसा लग सकता है। कुछ समय पहले तक यह सवाल विज्ञान कथाओं और हॉलीवुड फिल्मों तक सीमित था, लेकिन यह बहस अब प्रयोगशाला तक पहुंच गई, जहां हाल ही अमरीकी वैज्ञानिकों ने पहली बार मानव भ्रूणों में नई जीन एडिटिंग तकनीक ‘बेस एडिटिंग’ के जरिए इसे सच करने का दावा किया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह शोध तक सीमित है और नियमित चिकित्सीय उपयोग अभी कई वर्ष दूर है। ग्रैंड व्यू रिसर्च, फॉच्र्यून बिजनेस इनसाइट, आइसीएमआर के अनुसार इसके लिए अभी मोजेकिज्म (आनुवांशिक उत्परिवर्तन), नैतिकता और कानूनी मंजूरी जैसी चुनौतियां हैं।

इस शोध से दुनिया में ये बहस तेज हो गई कि यदि विज्ञान जन्म से पहले आनुवांशिक बीमारियां खत्म कर सकता है, तो क्या भविष्य में मनचाहे गुणों वाले 'डिजाइनर बेबी' बनाए जाएंगे, जो प्रकृति के नियमों को हमेशा के लिए बदल सकता है। डिजाइनर बेबी का अर्थ ऐसे बच्चे से है, जिसके जन्म से पहले ही उसके माता-पिता और वैज्ञानिकों द्वारा उसकी आनुवांशिक संरचना में अपनी मर्जी के मुताबिक बदलाव करा दिया गया हो।

क्या है यह तकनीक?

शरीर की हर कोशिका में मौजूद डीएनए में लाखों आनुवांशिक निर्देश होते हैं। जीन एडिटिंग इसमें आई गड़बड़ी को इसे ठीक करने का मौका देता है।

  1. क्रिस्पर-केस9: इसे आनुवांशिक दुनिया की 'मॉलिक्यूलर कैंची' कहा जाता है। यह डीएनए के उस हिस्से की पहचान कर उसे काटती है, जहां बीमारी पैदा करने वाला जीन मौजूद होता है।
  2. बेस एडिटिंग : इसमें पूरे डीएनए को काटने के बजाय केवल एक गलत आनुवांशिक अक्षर को बदला जाता है। इसे ऐसे समझिए जैसे पूरी किताब का पन्ना फाडऩे के बजाय केवल गलत शब्द की स्पेलिंग सुधार दी जाए। हालिया अमरीकी शोध में इसी का इस्तेमाल हुआ।

क्यों चर्चा में है तकनीक

दुनिया में 7,000 से अधिक दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियां पहचानी जा चुकी हैं। इनमें थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया और ड्यूशेन मस्कुल कई बीमारियों का स्थायी इलाज नहीं है। यदि भ्रूण अवस्था में ही दोषपूर्ण जीन को ठीक किया जा सके तो बच्चा जन्म से ही इन बीमारियों से मुक्त हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल इस तकनीक का उद्देश्य गंभीर बीमारियों की रोकथाम है, न कि मनचाहे गुणों वाले बच्चे तैयार करना।

इसके संभावित फायदे

  1. थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया और हंटिंगटन जैसी गंभीर बीमारियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचने से रोका जा सकता है।
  2. भ्रूण स्तर पर आनुवांशिक दोषों को ठीक कर कुछ गंभीर जन्मजात बीमारियों से होने वाली मृत्यु का जोखिम कम किया जा सकता है।
  3. जिन आनुवांशिक बीमारियों का आज प्रभावी इलाज नहीं है, उनके उपचार की नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
  4. भविष्य में मरीज के आनुवांशिक प्रोफाइल के आधार पर अधिक सटीक इलाज विकसित करने में मदद मिल सकती है।

ये जोखिम भी

  1. गलत स्थान पर जीन एडिटिंग होने से नई बीमारी, कैंसर या अन्य गंभीर दुष्प्रभाव पैदा हो सकते हैं।
  2. भ्रूण में बदलाव आने वाली पीढिय़ों तक पहुंच सकता है। इसलिए किसी गलती की कीमत भी पीढिय़ों को भुगतनी पड़ेगी।
  3. यदि समाज में एक जैसे 'आदर्श' गुणों वाले बच्चों की मांग बढ़ी तो मानव प्रजाति की प्राकृतिक विविधता प्रभावित हो सकती है।
  4. बच्चे को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय पसंद के मुताबिक तैयार किए गए 'उत्पाद' की तरह देखने का खतरा पैदा हो सकता है।

स्वास्थ्य और समाज पर दूरगामी असर

  1. सामाजिक और आर्थिक असमानतायदि यह तकनीक बेहद महंगी रही तो केवल संपन्न परिवार ही इसका लाभ उठा सकेंगे। इससे आर्थिक असमानता के साथ-साथ जैविक असमानता का नया स्वरूप भी पैदा हो सकता है।
  2. 'परफेक्ट' बनने का दबावयदि किसी बच्चे के जीन चुनकर बदले गए हों, तो उस पर हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की अपेक्षा बढ़ सकती है। इससे उसके मानसिक स्वास्थ्य और बचपन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

चीन के बाद कई देशों में लगा बैन


2018 में चीन के वैज्ञानिक हे जियानकुई ने एचआईवी संक्रमण का जोखिम कम करने के लिए भ्रूण के क्रिस्पर5 जीन में बदलाव कर दुनिया के पहले जीन-संपादित जुड़वां बच्चों के जन्म का दावा किया था। इस प्रयोग की दुनिया भर में कड़ी आलोचना हुई, बाद में उन्हें जेल की सजा भी हुई। इसके बाद ज्यादातर देशों ने भ्रूण की जीन एडिटिंग पर बैन किया।

26 हजार करोड़ का वैश्विक बाजार

क्रिस्पर आधारित जीन एडिटिंग तकनीकों का वैश्विक बाजार फिलहाल करीब 3.2 अरब डॉलर (लगभग 26 हजार करोड़ रुपए) का आंका गया है। विभिन्न बाजार अध्ययनों के अनुसार 2035 तक इसके 28 अरब डॉलर (करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचने का अनुमान है।

भारत में प्रतिबंधित


भारत में आईसीएमआर और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के दिशा-निर्देशों के तहत मानव भ्रूण (जर्मलाइन) की जीन एडिटिंग का चिकित्सीय उपयोग प्रतिबंधित है। हालांकि देश में आइवीएफ, जेनेटिक टेस्टिंग और जीन आधारित चिकित्सा का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।