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घर और दुकानों को छोड़िए… इस जिले के बैंकों में भी नहीं लगते ताले, जानिए अजब-अनोखी वजह

Ancient Traditions: कहीं घरों में नहीं लगाते ताले तो कहीं पक्के घर ही नहीं। किसी गांव में धूम्रपान निषेध तो कहीं दो मंजिल से ज्यादा नहीं बनाने मकान। जी हां, डिजिटल युग में जिंदा हैं सदियों पुरानी अजब-अनोखी परंपराएं…

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भारत

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Saurabh Mall

Feb 23, 2026

ancient traditions

अजब-अनोखी परंपराएं: इस जिले के बैंकों में भी नहीं लगते ताले (सोर्स: AI जनरेटेड इमेज चैट GPT)

नई दिल्‍ली. 21वीं सदी के साथ ही मोबाइल क्रांति ने शहर से देहात तक जीवन को काफी बदल दिया। एआइ, डीपटेक और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस डिजिटल छवि के बावजूद देश की मिट्टी में रची-बसी सदियों पुरानी परंपराओं की खुशबू आज भी वैसी ही है। खास बात ये है कि इन परंपराओं को बुजुर्ग ही नहीं युवा पीढ़ी भी पूरी आस्था और गर्व से आगे बढ़ा रही है। जिस दौर में स्मार्ट लॉक और फिंगरप्रिंट सेंसर जैसी सुरक्षा की तकनीक के बावजूद घर के दरवाजे खुले छोड़ दिए जाते हों। मकान बनाने की एक से बढकऱ एक निर्माण शैली और साधन संपन्न होने के बावजूद पक्के घर नहीं बनाए जाते हों तो इसे परंपराओं में अटूट विश्वास ही कहा जाएगा। ऐसे ही कई अनोखी परंपराएं हैं, तो आज भी उसी स्वरूप में जिंदा हैं, जो सदियों पहले थीं। खास बात ये है कि युवा पीढ़ी

शनि शिंगणापुर: घरों में नहीं लगाते ताले

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शनि शिंगणापुर के घरों, दुकानों और यहां तक कि बैंकों में भी ताले या चौखट नहीं होते। ग्रामीणों का मानना है कि स्वयं शनिदेव उनके घरों की रक्षा करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि आज यहां के युवा स्टार्टअप्स चला रहे हैं, सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन रहे हैं, लेकिन जब घर लौटते हैं, तो परंपरा का सम्मान करते हुए घर को बिना ताले के ही छोड़ते हैं। यहां शून्य अपराध का अद्भुत सामाजिक मॉडल है।

मत्तूर: बोलचाल की भाषा संस्कृत, चैटिंग भी

कर्नाटक के मत्तूर गांव में आज भी बोलचाल की मुख्य भाषा 'संस्कृत' है। यहां का युवा गूगल और एआइ टूल्स का इस्तेमाल भी संस्कृत में ही करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि तकनीक और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।

यहां दूसरी मंजिल नहीं बनाते लोग

पाली/जोधपुर. पाली जिले के सिवास गांव में दो मंजिला से ऊंचा मकान नहीं बनाया जाता है। गांव की आस्था के केन्द्र माता महाकाली मंदिर के आगे के हिस्से में एक झरोखा है। उस झरोखे से ऊंचा गांव में किसी भी जाति या धर्म का व्यक्ति मकान नहीं बनाता है। इसके अलावा जोधपुर जिले के डांगियावास गांव में ठाकुरजी मंदिर की परंपरा एवं डीडवाना के जसराणा में लोक देवता अल्लू बापजी के प्रति आस्था के कारण लोग मकान की दूसरी मंजिल नहीं बनाते। जोधपुर के निकट डोली गांव और चूरू जिले के उदसर में भी दूसरी मंजिल नहीं बनाने की परंपरा 700 सालों से बदस्तूर निभाई जा रही है।

ब्यावर का देवमाली : पक्के मकान नहीं बनाते

ब्यावर के देवमाली गांव में भगवान देवनारायण की मान्यता के चलते पक्के मकान या दूसरी मंजिल नहीं बनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि भगवान देवनारायण कच्चे मकान में रहे तो वह क्यों पक्का बनाएं।

छालिया की ‘बेरंग’ दिवाली: न रंग न रंगोली

रतलाम. आलोट शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर कछालिया में घरों पर रंग-रोगन नहीं होता। 300 से ज्यादा घरों वाले गांव में आज तक ग्रामीणों ने घर का रंग-रोगन नहीं किया। दिवाली पर भी न कोई कलर ना रंगोली। सरकारी कार्यालय और मंदिरों को पूरा गांव बेरंग है। 1500 की आबादी वाले गांव में नई पीढ़ी भी इस परंपरा का निर्वाह कर रही है। इतना ही नहीं गांव में कोई भी काले कपड़े या काले जूते नहीं पहनता। घर के ऊपर कवेलू तक नहीं बिछाते।

धनगांव : सारे पर्व एक दिन पहले मनाते हैं

मंडला जिले का धनगांव में आज भी होली, दिवाली सहित सभी प्रमुख पर्व तय तिथि से एक दिन पहले मनाए जाते हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि तिथि पर पर्व मनाने से अनिष्ट की आशंका रहती है। अतीत में किसी अप्रिय घटना के बाद से यह परंपरा शुरू हुई थी। नई पीढ़ी ने भी पुरखों की परंपरा को नहीं लांघा।

इटारसी का बमूरिया : अमावस्या-पूर्णिमा पर सड़कें लीपते हैं ग्रामीण

इटारसी. नर्मदापुरम जिले का गांव बमूरिया में सुख-समृद्धि के लिए हर अमावस्या और पूर्णिमा के दिन रास्तों और मोहल्लों में गोबर से लीपने की परंपरा है। करीब एक हजार की आबादी वाले गांव में आज ज्यादातर सडक़ें सीमेंट की बन गई, लेकिन लीपने की परंपरा फिर भी बनी हुई है। गांव के योगेंद्र सिंह सोलंकी ने बताया कि इसका बड़ा फायदा यही है कि गांव में एकता बनी रहती है, क्योंकि गांव के महिला-पुरुष साथ आ जाते हैं।

श्योपुर का मेवाड़ा: 200 वर्ष से कोई शराब को छूता भी नहीं

श्योपुर. जिले के मेवाड़ा गांव में बीते करीब 200 वर्ष से शराबबंदी है। गांव में पीर बाबा की मान्यता के चलते दो हजार की आबादी वाले मीणा बाहुल्य गांव में कोई शराब को छूता भी नहीं। गांव के जसवंत मीणा के अनुसार यदि कोई चोरी-छिपे गांव से बाहर कहीं शराब पी लेता है तो उसके घर में गृह क्लेश, आर्थिक तंगी व अन्य कई व्याधियां शुरू हो जाती हैं।

माजरा काठ : यहां कोई नहीं करता धूम्रपान

बहरोड. कोटपूतली-बहरोड़ जिले के माजरा काठ गांव में बाबा मोहनराम की मान्यता के चलते कोई भी धूम्रपान नहीं करता है। जाट बाहुल्य गांव में युवा पीढ़ी भी इस परंपरा को पूरे सम्मान से निर्वाह कर रही है। गांव के देवीदयाल शर्मा ने बताया कि आज तक सभी इस परंपरा को निभाते आए हैं। इससे गांव में खुशहाली बनी रहती है। इस मान्यता को नहीं मानने से अनिष्ट की आशंका रहती है। यहां आने वाले मेहमानों को भी इसकी पालना करनी होती है।