
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी
वर्तमान पीढ़ी को परिक्रमा का वातावरण समझने की जरूरत है। जिस मूर्ति की परिक्रमा की जाती है, उसमें प्राण प्रतिष्ठित होते हैं। लोग जब परिक्रमा करते हैं तो शरीर उस मूर्ति के आभामंडल से निकलता। यही कारण होता है, लोग बीमार नहीं होते थे। परिक्रमा के केंद्र में जो है वह सत्य की मूर्ति है।
यह बात पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कही। वे राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में शनिवार को मध्यप्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री प्रहलाद पटेल की नर्मदा परिक्रमा पर लिखी पुस्तक ‘परिक्रमा-कृपा सार’ पर बोल रहे थे। कोठारी ने कहा, इस पुस्तक में दर्शन और विज्ञान भाव का विस्तार है। बीज का लक्ष्य, पेड़ बनना है। पेड़ तब बनेगा जब जमीन में गड़ेगा। जब फल बनेंगे तो सृष्टि के काम आएंगे। हमें ये सोचना चाहिए कि जीवन सृष्टि के लिए हुआ है। पुस्तक चर्चा के सूत्रधार इंद्रा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स के मेंबर ट्रस्टी देवेन्द्र कुमार शर्मा थे।
पुस्तक के लेखक प्रहलाद पटेल ने पुस्तक चर्चा में बताया, 'परिक्रमा पूर्णता, परिपूर्णता और संपूर्णता देती है। हम जब जीवन की हर बात पर चर्चा करते हैं, तो महर्षि मार्कण्डेय का उदाहरण सामने आता है। उन्हें दीर्घायु जीवन मिला, लेकिन उन्हें भी अनेक परीक्षाओं से गुजरना पड़ा। जो व्यक्ति सही मार्ग पर चलता है, उसे कष्ट सहने पड़ते हैं, लेकिन हमें उन कष्टों से आगे निकलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जीवन की परीक्षा स्वीकार करना ही साधना है।
Updated on:
04 Jan 2026 04:59 am
Published on:
04 Jan 2026 04:48 am
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