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मनी-लॉन्ड्रिंग को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 1 साल में नहीं साबित हो पाया आरोप तो वापसी होगी जब्त संपत्ति

प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि 365 दिनों की जांच के बाद भी कुछ साबित नहीं होता है तो फिर संपत्ति को संबंधित शख्स को लौटाना होगा।  

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दिल्ली हाईकोर्ट ने मनी-लॉन्ड्रिंग केस की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को एक बड़ा फैसला सुनाया है। अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ चल रही जांच में एक साल तक कोई भी आरोप साबित नहीं हो पाते है तो प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को उसकी जब्त की गई संपत्ति लौटानी होगी। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि यदि धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) के तहत जांच अपराध से संबंधित किसी भी कार्यवाही के बिना 365 दिनों से अधिक द‍िनोें तक जारी रहती है, तो जब्‍त की गई संपत्ति संबंधित व्यक्ति को वापस कर दिया जाना चाहिए।


तो वापस करनी होगी जब्त संपत्ति

न्यायमूर्ति नवीन चावला ने कहा कि निर्दिष्ट अवधि के बाद इस तरह की जब्ती जारी रखना भारत के संविधान के अनुच्छेद 300ए का उल्लंघन होगा। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के इस तर्क को खारिज करते हुए कि पीएमएलए की धारा 8(3)(ए) 365 दिनों के बाद परिणाम का प्रावधान नहीं करती है, अदालत ने कहा कि स्वाभाविक परिणाम जब्ती की चूक है, और संपत्ति वापस की जानी चाहिए।

शिकायत के बिना 365 दिनों से चल रही थी जांच

इस मामले में भूषण पावर एंड स्टील लिमिटेड (बीपीएसएल) के अंतरिम समाधान पेशेवर के रूप में नियुक्त महेंद्र कुमार खंडेलवाल शामिल थे। ईडी ने बीपीएसएल के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अगस्त 2020 में खंडेलवाल के परिसर से दस्तावेज, रिकॉर्ड, डिजिटल उपकरण और आभूषण जब्त किए। नियुक्त महेंद्र कुमार, जिनका नाम एफआईआर में नहीं था, ने अपने खिलाफ किसी भी शिकायत के बिना 365 दिनों से अधिक समय के बाद जब्त की गई वस्तुओं को वापस करने की मांग की, लेकिन ईडी ने इनकार कर दिया। अब कोर्ट ने कहा है कि जब्त की गई वस्तुएं वापस की जानी चाहिए।

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