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सरकार चाहे तो बच सकते हैं भारतीय परिवार के 10 से 15 हजार रूपए, जानें कैसे?

Health Budget in India: भारतीय परिवार बीमारियों पर औसतन सालाना 20,000 से 30,000 रुपए तक इलाज पर खर्च कर रहे है। साथ ही मेडिकल पॉलिसी पर सालाना औसतन प्रीमियम 15 हजार रुपए से 50 हजार रुपए तक चुकाया जा रहा है। पढ़िए विकास जैन की स्पेशल रिपोर्ट।

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भारत

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Devika Chatraj

Apr 07, 2025

Health Care in India: भारत सरकार का स्वास्थ्य बजट सालाना करीब एक लाख करोड़ रुपए का है। इसमें टीकाकरण व प्रसव पूर्व देखभाल के बजट को शामिल कर 10 से 15% प्रिवेंशन पर खर्च होता है। संतुलित आहार, स्वास्थ्य शिक्षा और नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम पर किया जाने वाला खर्च 5% से भी कम हैं। भारत में बीमारियों के इलाज पर होने वाला खर्च जीडीपी का 6% तक पहुंच सकता है। इसके विपरीत प्रिवेंशन पर ध्यान दिया जाए तो यह खर्च आधा हो सकता है। भारतीय परिवार औसतन सालाना 20,000 से 30,000 रुपए तक इलाज पर खर्च कर रहे है। गंभीर बीमारियों में यह खर्च कई गुना बढ़ जाता है। मेडिकल पॉलिसी पर सालाना औसतन प्रीमियम 15 हजार रुपए से 50 हजार रुपए तक चुकाया जा रहा है।

स्वास्थ्य शिक्षा पर जोर दे सरकार

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में निरोगी रखने के उपायों को प्रेरित किया जाना चाहिए। गांवों और शहरों में मरीज चिह्नित करने के लिए स्वास्थ्य कैंप तो लगाते हैं। लेकिन बीमारियों से बचाव के उपाय वाले कार्यक्रम सरकार की ओर से उनकी अनिवार्य सूची में नहीं है। स्वास्थ्य शिक्षा को अनिवार्य होना चाहिए और शिक्षण संस्थाओं, पंचायत और निकाय स्तर तक स्वास्थ्य जागरूकता और फिटनेस कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

सरकार की योजना मददगार

आधुनिक भारत में स्वास्थ्य प्रिवेंशन के लिए शोध पर नाम मात्र का काम हो रहा है। कई राज्यों में इलाज का खर्च उनकी क्षमता से बाहर है। वे कर्ज में डूबते हैं। बीमारियों की रोकथाम नहीं होने से व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर असर पडने के साथ देश की आर्थिक विकास दर प्रभावित होती है। आयुष्मान जैसी योजना ने लोगों की स्वास्थ्य चिंता को काफी हद तक नियंत्रित कर दिया है। केंद्र ने फिट इंडिया और राजस्थान सरकार ने निरामय अभियान शुरू कर इसकी शुरुआत की है। बड़ी योजनाओं में प्रिवेंशन पर फोकस कर स्वास्थ्य शिक्षा, जागरूकता केंद्रित किया जा सकता है।

बीमारी के नाम पर धंधा

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में स्वास्थ्य के नाम पर उलटबांसी चल रही है। हमारा पूरा ध्यान रोगों के निवारण पर है, निरोगी काया पर नहीं। पश्चिमी जीवन-शैली की घुसपैठ के कारण साल-दर-साल बीमारियों के इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा और पश्चिम की ही बहुराष्ट्रीय कंपनियां मोटा मुनाफा कमा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस एक मौका है सरकारी उलटबांसी को सुधारने पर विचार करने का। यह तय करने का कि सरकार उन योजनाओं और कार्यक्रमों पर अपना खर्च बढ़ाए जो लोगों को अस्पतालों से दूर रख सके।

महिलाओं के स्वास्थ पर WHO

महिलाओं के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता दी जाए। डब्ल्यूएचओ और उसके साझेदार स्वस्थ गर्भधारण, प्रसव और बेहतर प्रसवोत्तर स्वास्थ्य के लिए उपयोगी जानकारी भी साझा करेंगे। डब्ल्यूएचओ के अनुमान के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब तीन लाख महिलाएं गर्भावस्था या प्रसव के कारण जान गंवाती हैं, जबकि 20 लाख से ज्यादा बच्चे जीवन के पहले महीने में ही दम तोड़ देते हैं। करीब इतने ही बच्चे मृत पैदा होते हैं। सही देखभाल, खान-पान और इलाज की सुविधा मिले तो इन्हें बचाया जा सकता है।

भारत में पहले से काफी सुधार

भारत में मातृ और शिशु मृत्यु दर के आंकड़ों में पहले के मुकाबले काफी सुधार हुआ है, लेकिन इस दिशा में और प्रयास करने की जरूरत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में तीन साल तक के 3.88% बच्चों का विकास उम्र के हिसाब से नहीं हो पाता, 46% बच्चों का वजन कम होता है, जबकि 79.2% बच्चे एनीमिया से पीड़ित होते हैं। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया 50 से 58% बढ़ा है।

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