
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स-ANI)
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य क्षेत्र में अवैध रेत खनन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश और राजस्थान सरकार के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। हाल में मध्य प्रदेश के मुरैना में एक वन रक्षक की ट्रैक्टर से कुचलकर हुई मौत की घटना के बाद कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने पूछा कि इतने बड़े पैमाने पर अवैध खनन को आखिर शुरू से ही कैसे चलने दिया गया? कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह स्थिति या तो प्रशासनिक विफलता है या फिर मिलीभगत का संकेत देती है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अवैध खनन के मुद्दे पर तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा- यह सब आपकी नाक के नीचे हो रहा है, लेकिन अधिकारी आंखें बंद कर झूठे हलफनामे दे रहे हैं। बेंच ने तीखे शब्दों में पूछा कि अगर राज्य अपने अधिकारियों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा नहीं कर सकता तो उसके अस्तित्व का क्या औचित्य है? सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में अवैध रेत खनन से जुड़े 'स्वतः संज्ञान' के मामले की सुनवाई में यह टिप्पणियां की हैं। पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश सरकार ने कोर्ट के सामने यह स्वीकार किया था कि चंबल क्षेत्र में सक्रिय अवैध रेत खनन माफियाओं का मुकाबला करने के लिए उसके अधिकारियों के पास पर्याप्त हथियार नहीं हैं।
सुनवाई में कोर्ट को बताया गया कि अटेर-फतेहपुर पुल के 34 खंभों में से 8 के पास भारी मात्रा में अवैध खनन हो रहा है। एमिकस क्यूरी निखिल गोयल ने बताया कि पुल के खंभों के नीचे से 25 से 50 फीट तक रेत निकाली जा चुकी है। इससे न केवल पुल की मजबूती पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि रोजाना इससे गुजरने वाले 5,000 से अधिक लोगों की जान भी जोखिम में है। कोर्ट ने इन तथ्यों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि तस्वीरें चौंकाने वाली हैं।
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कोर्ट को बताया कि वन रक्षक की मौत की जांच जारी है और पुल के नीचे हो रहे खनन की जांच के लिए एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई गई है, जो जल्द रिपोर्ट देगी। इस पर कोर्ट ने तीखा सवाल दागा कि क्या रिपोर्ट तब आएगी, जब पुल गिर चुका होगा और लोगों की जान जा चुकी होगी? हालांकि, सरकार ने एक सप्ताह में रिपोर्ट देने का आश्वासन दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल निगरानी उपाय लागू करने का सुझाव दिया। कोर्ट ने कहा कि प्रभावित इलाकों में ऊंचे खंभों पर हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे लगाए जाएं और खनन में लगे ट्रैक्टर, अर्थमूवर्स और अन्य वाहनों में जीपीएस ट्रैकर अनिवार्य किए जाएं, ताकि उनकी आवाजाही पर नजर रखी जा सके। कोर्ट ने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और राज्य सरकारों को इन उपायों के लिए व्यावहारिक योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 अप्रेल को होगी, जहां इन सुझावों पर प्रगति की समीक्षा की जाएगी।
Updated on:
14 Apr 2026 05:33 am
Published on:
14 Apr 2026 05:32 am
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