
First President of India - Rajendra Prasad
Independence Day 2021: आज से 72 साल पहले जब 26 जनवरी, 1950 को भारत एक गणतंत्रीय राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने अस्तित्व में आया, ठीक उसी दिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद ( Dr. Rajendra Prasad ) स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। खास बात यह है कि आजादी ( Independence ) मिलने के बाद देश का प्रथम राष्ट्रपति उस आदर्श पुरुष को बनाया गया जो अपने खान-पान, पहनावा, चाल-चलन व विचारों से भारतीय संस्कृति और उसके मूल्यों के जीवित मूर्ति थे।
राजेंद्र जी के नाम है 2 बार राष्ट्रपति बनने का रिकॉर्ड
डॉ. राजेंद्र बाबू इंडिया के एकमात्र राष्ट्रपति थे जिन्हें लगातार दो बार राष्ट्रपति पद पर काम करने का अवसर मिला। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर रहते हुए राजेंद्र प्रसाद ने कई देशों की सद्भावना यात्राएं भी की। साथ ही परमाणु संपन्न विश्व में शांति बनाए रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। 1962 में राजनैतिक और सामाजिक योगदान के लिए उन्हें भारत रत्न से नवाजा गया।
1905 में लिया था इस बात का संकल्प
देश पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू का जन्म बिहार के जीरादेई नामक गांव में 3 दिसंबर, 1884 को हुआ था। उनके बड़े भाई महेंद्र प्रसाद जी न सिर्फ बड़े भाई थे, बल्कि बाद में वे ही उनके मित्र और मार्गदर्शक भी बने। उन्होंने राजेंद्र बाबू को सार्वजनिक नेता बनने की सुविधा देकर स्वयं उनके परिवार की देखरेख का भार अपने ऊपर ले लिया। अगर वे वे ऐसा न करते तो संभवत: राजेंद्र प्रसाद को लोक सेवा का अवसर न मिलता। राजेंद्र प्रसाद ( Rajendra Prasad ) ने छपरा से दसवीं पास करने के बाद कोलकाता के कॉलेज में दाखिल लिया और सार्वजनिक कार्यों में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। 7 अगस्त, 1905 को कोलकाता में बंग-भंग के विरुद्ध एक जनसभा में शामिल हुए। उस दिन उन्होंने संकल्प लिया कि वे विदेशी वस्तुओं के उपयोग से बचेंगे। जीवनपर्यंत इस संकल्प का पालन करते रहे।
ऐसे बने गांधी के वफादार साथी
कांग्रेस के एक समर्पित कार्यकर्ता की छवि की वजह से वह जल्द ही गांधी जी के संपर्क में आ गए। चंपारण आंदोलन के दौरान राजेंद्र प्रसाद गांधी जी के वफादार साथी बन गए थे। वह राष्ट्रीय कांग्रेस से एक से अधिक बार अध्यक्ष भी रहे। संविधान सभा के अध्यक्ष भी बने। उसके बाद 26 जनवरी, 1950 को भारत गणतंत्र बना और देश को अपना पहला राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के रूप में मिल गया। भारतीय राजनीति के इतिहास में उनकी छवि एक महान और विनम्र राष्ट्रपति की है।
नेहरू ने राजेंद्र बाबू को सोमनाथ मंदिर जाने से क्यों रोका?
दरअसल, 1947 में भारत के तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल नेहरू के इच्छा के खिलाफ सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करा रहे थे। इस मुद्दे पर पंडित जवाहर लाल नेहरू ( Pandit Jawaharlal Nehru ) और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का दृष्टिकोण अलग-अलग था। सोमनाथ मंदिर निर्माण का काम पूरा होने के बाद उसके उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को आमंत्रित किया गया था। लेकिन नेहरू नहीं चाहते थे कि देश के राष्ट्रपति किसी धार्मिक कार्यक्रम में शरीक हों। नेहरू का दृष्टिकोण था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और राष्ट्रपति के इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल से लोगों के बीच गलत संदेश जाएगा। इस आधार पर उन्होंने राजेंद्र बाबू को वहां जारे से रोकने का प्रयास किया था। इसके बावजूद वह कार्यक्रम में शामिल हुए।
Updated on:
15 Aug 2021 06:46 pm
Published on:
15 Aug 2021 06:40 pm
बड़ी खबरें
View Allबिहार चुनाव
राष्ट्रीय
ट्रेंडिंग
