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भारत की GDP दर बढ़ने का अनुमान, पर कृषि का क्यों घटा योगदान? जानिए आम आदमी के लिए इसके क्या हैं मायने

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी दर 7.4% रहने का अनुमान है, लेकिन कृषि विकास दर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। रिकॉर्ड मानसून के बावजूद खेती की रफ्तार 4.6% से घटकर 3.1% क्यों रह गई? जानिए इस गिरावट के पीछे के असली कारण और आम आदमी पर इसके असर की पूरी रिपोर्ट।

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Agricultural Growth Slowdown: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत की वास्तविक जीडीपी 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 6.5 प्रतिशत से बेहतर है। लेकिन कृषि, वानिकी एवं मत्स्य पालन क्षेत्र की सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) वृद्धि दर पिछले वर्ष के 4.6 प्रतिशत से घटकर मात्र 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। यह गिरावट चौंकाने वाली है, क्योंकि देश में 2025 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 8 प्रतिशत अधिक रहा और खरीफ फसलों का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

विशेषज्ञों के अनुसार कृषि में इस मध्यम वृद्धि के पीछे कई कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण उत्तर-पश्चिम भारत में देर से हुई अत्यधिक बारिश है। जिसने सोयाबीन, कपास और अन्य खरीफ फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया। अक्टूबर 2025 में 44 प्रतिशत ज्यादा भारी बारिश ने कई राज्यों में तिलहन व दलहन की फसलों को बर्बाद कर दिया, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ और किसानों पर कर्ज बढ़ा।

इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव के कारण रबी फसल की बुवाई में देरी हुई, जो 2025-26 की वृद्धि पर असर डालेगी। दूसरा कारण बेस इफेक्ट है। वर्ष 2024-25 में कृषि क्षेत्र ने औद्योगिक मंदी के बीच 4.6 प्रतिशत वृद्धि के साथ मजबूत प्रदर्शन किया था, जिसके बाद सामान्यीकरण स्वाभाविक है।

आईसीआरए जैसी रेटिंग एजेंसियों ने पहले ही अनुमान लगाया था कि सामान्य मानसून के बावजूद कृषि जीवीए 3.5-4.0 प्रतिशत के दायरे में रहेगी। वैश्विक कारक जैसे बढ़ते टैरिफ और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी निर्यात को प्रभावित किया। यह गिरावट ग्रामीण उपभोग और आय पर असर डालेगी, क्योंकि देश की जीडीपी में 16 प्रतिशत का बड़ा योगदान कृषि देता है। हालांकि सरकार ने पीएम-किसान और फसल बीमा जैसी योजनाओं से सहारा दिया, लेकिन कृषि विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन से निपटने, सिंचाई विस्तार और विविधीकरण पर जोर दे रहे हैं।