
Indus Water Treaty (AI Image)
Indus Water Treaty: सिंधु की पश्चिमी नदियों का पानी राजस्थान तक पहुंचाने की बहुप्रतीक्षित योजना अब धरातल पर उतरती दिखाई दे रही है। पहलगाम हमले के बाद सिंधु जल संधि निलंबित होने के बाद भारत ने सिंधु बेसिन की पश्चिमी नदियों के अतिरिक्त पानी के उपयोग की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं। इसी कड़ी में चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास रिवर सिस्टम में मोड़ने की परियोजना पर काम शुरू कर दिया गया है।
इसके तहत चिनाब की सहायक नदी चंद्रा के पानी को हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में सुरंग के जरिए ब्यास नदी में डाइवर्ट किया जाएगा। इस परियोजना पर करीब 2352 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
ब्यास रिवर सिस्टम में पानी पहुंचने के बाद इसका लाभ राजस्थान तक मिलेगा। वहीं जम्मू के पास सलाल बांध में गाद रोकने के लिए 268 करोड़ रुपए की अलग नहर परियोजना पर भी काम किया जाएगा। दोनों परियोजनाओं की कुल लागत 2620 करोड़ रुपए बताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार इन परियोजनाओं की जिम्मेदारी एनटीपीसी को सौंपी गई है।
केंद्र सरकार की योजना 2029 से पहले चिनाब-ब्यास लिंक के जरिए सिंधु बेसिन का पानी राजस्थान तक पहुंचाने की है। इसके लिए जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के 13 नहरी तंत्रों को आपस में जोड़ा जाएगा।
भारत को सिंधु की पश्चिमी नदियों के पानी में से 3.6 एमएएफ (मिलियन एकड़ फीट) पानी उपयोग करने का अधिकार है। हाल ही में केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों ने परियोजना की समीक्षा कर इसे 2029 से पहले पूरा करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अब कार्यादेश भी जारी किए जा चुके हैं।
परियोजना पूरी होने पर चिनाब का पानी इंदिरा गांधी नहर के जरिए राजस्थान के कई जिलों तक पहुंच सकेगा।
जम्मू-कश्मीर के रेसी तहसील क्षेत्र में चिनाब नदी पर बने सलाल बांध में भारी मात्रा में गाद जमा होने की समस्या रहती है। इसे रोकने के लिए 268 करोड़ रुपए की लागत से विशेष नहर बनाई जाएगी।
यह नहर रेतीले पानी को बांध तक पहुंचने से पहले अलग कर देगी। इससे जल विद्युत उत्पादन में भी तेजी आएगी क्योंकि सुरंग के जरिए पानी से रेत अलग की जा सकेगी।
भारत पहले ही रावी नदी के अपने हिस्से के पानी को पाकिस्तान जाने से रोकने की दिशा में बड़ा कदम उठा चुका है। पंजाब के पठानकोट जिले में बने शाहपुर कंडी बांध के जरिए रावी नदी के पानी को कठुआ के उझ बैराज की तरफ मोड़ा जा रहा है।
अब इस पानी का उपयोग पंजाब और जम्मू-कश्मीर में सिंचाई के लिए किया जाएगा। इससे पहले रावी का अधिकांश पानी पाकिस्तान चला जाता था। शाहपुर कंडी परियोजना से 206 मेगावाट बिजली उत्पादन भी होगा।
पूर्वी नदियां
इनका वार्षिक जल प्रवाह करीब 33 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) है।
पश्चिमी नदियां
इनका औसत वार्षिक जल प्रवाह करीब 135 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) है।
सीमा जल प्रबंधन विशेषज्ञ और मनोहर पर्रिकर आईडीएसए दिल्ली से जुड़े डॉ. यूके सिंह ने कहा कि भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित किया है और अब मानवीय परिस्थितियों को छोड़कर पाकिस्तान के साथ डेटा साझा नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि भारत अपने हिस्से के पानी के उपयोग के लिए परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रहा है और इसके ठोस परिणाम अगले कुछ वर्षों में दिखाई देंगे।
लाहौल क्षेत्र की चंद्रा नदी सर्दियों में पूरी तरह जम जाती है। मई से सितंबर के बीच ग्लेशियर पिघलने के दौरान नदी में पानी का प्रवाह तेजी से बढ़ता है। इसी अवधि में सुरंग के जरिए चिनाब का अतिरिक्त पानी ब्यास नदी में मोड़ा जाएगा, ताकि अधिकतम जल उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
Published on:
27 May 2026 03:40 am
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