
गगनयान और चंद्रयान जैसे मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफों से चिंता बढ़ी। (Photo- Patrika)
ISRO scientist resignation reason: देश की सबसे प्रतिष्ठित अंतरिक्ष एजेंसी ISRO में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में ISRO के 100 से अधिक वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है। हैरानी की बात यह है कि इस्तीफा देने वालों में गगनयान और चंद्रयान जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक भी शामिल हैं। ऐसे में सरकार और अंतरिक्ष विभाग की चिंता बढ़ गई है।
ISRO से वैज्ञानिकों के इस्तीफे की एक बड़ी वजह देश के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में आया तेज उछाल माना जा रहा है। हाल के वर्षों में सरकार ने निजी कंपनियों को बड़े सैटेलाइट प्रोजेक्ट सौंपने और लॉन्च व्हीकल तकनीक हस्तांतरित करने की नीति अपनाई है। इसके चलते अनुभवी वैज्ञानिकों की मांग काफी बढ़ गई है। निजी क्षेत्र की कंपनियां बेहतर वेतन, आकर्षक सुविधाएं और नए अवसर उपलब्ध करा रही हैं। यही कारण है कि कई अनुभवी वैज्ञानिक ISRO छोड़कर निजी स्पेस इंडस्ट्री का रुख कर रहे हैं।
आंकड़ों पर गौर करें तो ISRO में 14,600 से अधिक वैज्ञानिक और कर्मचारी कार्यरत हैं। ऐसे में इस्तीफा देने वालों की संख्या भले ही कम दिखाई दे, लेकिन इसका प्रभाव दूरगामी हो सकता है। वजह साफ है कि महत्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़े अनुभवी वैज्ञानिकों के जाने से राष्ट्रीय महत्व के मिशनों की गति प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है।
करीब 1,339 कर्मचारियों वाले यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से लगभग 80 वैज्ञानिक इस्तीफा दे चुके हैं। वहीं, 4,577 कर्मचारियों वाले विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से कम से कम 20 वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने त्यागपत्र दिया है। इनमें LVM-3 परियोजना के निदेशक विक्टर जोसेफ और चंद्रयान-3 के प्रोजेक्ट मैनेजर आदित्य रल्लापल्ली जैसे प्रमुख नाम भी शामिल हैं।
प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों के बढ़ते इस्तीफों के बाद सरकार ने कुछ कड़े फैसले लिए हैं। नए निर्देशों के अनुसार, अब ISRO के विभिन्न केंद्रों के निदेशक अपनी मर्जी से किसी भी ग्रुप-ए वैज्ञानिक या इंजीनियर का इस्तीफा स्वीकार नहीं कर सकेंगे।
यदि कोई वैज्ञानिक किसी महत्वपूर्ण मिशन या परियोजना से जुड़ा है, तो उसका इस्तीफा मिशन पूरा होने तक प्रभावी नहीं होगा। इसके अलावा, अब किसी भी वैज्ञानिक को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) या इस्तीफा देने के लिए अधिक कड़ी प्रक्रिया से गुजरना होगा। अंतिम फैसला सीधे नई दिल्ली स्थित अंतरिक्ष विभाग के मुख्यालय द्वारा लिया जाएगा।
वैज्ञानिकों के ISRO छोड़ने के मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर भी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने लिखा, 'आप संस्थान के दरवाज़ों पर ताले लगा सकते हैं, लेकिन प्रतिभा को कैद नहीं कर सकते। अगर वैज्ञानिक अभूतपूर्व संख्या में ISRO छोड़ रहे हैं, तो सरकार को सिर्फ उनके जाने पर रोक लगाने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे जा क्यों रहे हैं। भारत की अंतरिक्ष यात्रा जमीन पर गिरते मनोबल के सहारे आगे नहीं बढ़ सकती।'
वहीं, संदीप मनुधाणे ने कहा, 'अगर राजनीतिक नेतृत्व चाहता, तो ISRO भारत का स्टारलिंक बन सकता था। लेकिन मौजूदा अंतरिक्ष नीतियों के चलते 2030 तक यह अपनी गौरवशाली पहचान का सिर्फ एक खोखला ढांचा बनकर रह जाएगा। यह इस समय अपनाई जा रही विभिन्न अंतरिक्ष नीतियों का स्वाभाविक परिणाम है।'
एक अन्य 'एक्स' यूजर ने लिखा, 'भारत ने वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। सरकार ने स्पेस स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया, उन्हें ISRO के बुनियादी ढांचे तक पहुंच दी और SSLV (स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) रॉकेट तकनीक HAL को हस्तांतरित की। 2019 में जहां निजी स्पेस कंपनियों की संख्या सिर्फ 11 थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 400 से अधिक हो गई। वित्त वर्ष 2025-26 में ही स्पेस स्टार्टअप्स को 147 मिलियन डॉलर से अधिक की फंडिंग मिली। अब वही सरकार एक मेमो जारी करती है, जिसमें कहा गया है कि गगनयान मिशन पूरा होने तक उससे जुड़े वैज्ञानिक इस्तीफा नहीं दे सकते। आपने प्रतिस्पर्धी बाजार बनाया, उसे वित्तीय सहायता दी और उसकी सफलता का जश्न मनाया। फिर उसी बाजार में लोगों के जाने से रोकने की कोशिश करने लगे। समाधान प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि बेहतर वेतन, सुविधाएं और कार्य-परिस्थितियां उपलब्ध कराना है।'
Updated on:
16 Jul 2026 01:01 pm
Published on:
16 Jul 2026 12:57 pm
