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‘धार्मिक प्रथाओं में राज्य कब हस्तक्षेप करे इस पर दिशा निर्देश तय करना संभव नहीं’, सबरीमला केस पर सुप्रीम कोर्ट का बयान

सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट ने नया बयान जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार धार्मिक प्रथाओं में राज्य कब हस्तक्षेप करे इस पर दिशा निर्देश तय करना संभव नहीं है।

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भारत

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Tanay Mishra

Apr 23, 2026

Supreme Court

Supreme Court (Photo - ANI)

सबरीमला केस में सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने सुनवाई के सातवें दिन स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथाओं में राज्य कब हस्तक्षेप कर सकता है, इस पर कोई सार्वभौमिक या भविष्य के लिए लागू होने वाले दिशा-निर्देश तय करना संभव नहीं है। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों का फैसला हर केस के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अदालत ने माना कि 'सामाजिक कल्याण और सुधार' एक व्यापक अवधारणा है और राज्य जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। यदि समाज किसी बुराई को खत्म करना चाहता है, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन यह हस्तक्षेप सीमित और न्यायिक जांच के अधीन होगा।

संतुलन बनाना ज़रूरी

सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत राज्य की शक्तियों पर विस्तृत बहस हुई। बेंच में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुन्द्रेश, एहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन बनाना हर मामले में ज़रूरी होगा।

महिला प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि यदि राज्य कानून बनाकर 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश देता है, तो क्या यह धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप होगा या सामाजिक सुधार माना जाएगा। सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह देखना होगा कि संबंधित प्रथा परंपरा का हिस्सा है या नहीं, और क्या इससे श्रद्धालुओं के अधिकार प्रभावित होते हैं। उन्होंने चेताया कि सुधार के नाम पर अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

अनुच्छेद 25(2)(बी) की सीमाएं और न्यायिक कसौटी

जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अनुच्छेद 25(2)(बी) को सीमित दायरे वाला बताते हुए कहा कि हस्तक्षेप केवल स्पष्ट सामाजिक सुधार के उद्देश्य से ही होना चाहिए। जस्टिस सुन्द्रेश ने कहा कि हर मामले में ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ की जांच जरूरी नहीं है। वहीं जस्टिस अरविंद कुमार ने पूछा कि एक ही धर्म में अलग-अलग प्रथाएं हों तो कोर्ट किस आधार पर निर्णय लेगा। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि हर मामले में तथ्यों के आधार पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा।