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चंपई सोरेन सरकार के खिलाफ ​बगावत, विश्वासमत से पहले झामुमो विधायकों में पड़ी फूट

locationनई दिल्लीPublished: Feb 04, 2024 07:02:05 pm

Submitted by:

Anand Mani Tripathi

Jharkhand Politics : झारखंड मुक्ति मोर्चा में फूट पड़ती हुई नजर आ रही है। झारखंड का झगड़ा अब बढ़ गया है। चंपई सोरेन ने शुक्रवार को 12वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली लेकिन अब उन्हें अपने ही विधायकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

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Jharkhand Politics : विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले ही झारखंड मुक्ति मोर्चा में फूट पड़ती हुई नजर आ रही है। झारखंड का झगड़ा अब बढ़ गया है। विधायकों को हॉर्सट्रेडिंग से बचाने के लिए हैदराबाद तो भेज दिया गया है लेकिन रांची में बैठ विधायक अब बगावत पर उतर आए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरन के जेल जाने के बाद से ही झारखंड में सियासत अपने चरम पर है।

इसी बीच चंपई सोरेन ने शुक्रवार को 12वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली लेकिन अब उन्हें अपने ही विधायकों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में अब झारखंड सरकार पर एक बार फिर से संकट मंडराता हुआ दिखाई दे रहा है और सवाल उठ रहा है कि चंपई ऐसी स्थिति में क्या अपना बहुमत साबित कर पाएंगे। फिलहाल 39 विधायक हैदराबाद में बिरयानी खा रहे हैं।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने मुख्यमंत्री चंपई सोरेन का विरोध करते हुए यह कहा कि शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन संथाल परगना से जीत कर गए थे और मुख्यमंत्री बने पर आज ऐसा दिन देखना पड़ रहा है कि कोल्हान से जीते हुए चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है। क्या संथाल परगना में आदिवासी नेता नही हैं? खुशी होती कि संथाल मुख्यमंत्री होता,पर इन्होंने दुखी किया।

एक और विधायक लोबिन हेम्ब्रम ने सत्यानंद भोक्ता को मंत्री पद देने का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कि बाहरी झामुमो पर कब्जा कर रहे हैं। वह बोरिया से विधायक हैं और यहीं क्षेत्र में यह बयान उन्होंने दिया। इसके बाद से वह पार्टी आलाकमान की पहुंच से दूर हो गए हैं। ऐस में एक बार फिर से पार्टी में हलचल मच गई है। हेम्ब्रम ने यह भी कहा कि जब वोट डालना होगा तब देखा जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी झारखंड में चल रहे इस नाटक पर पूरी तरह से नजर बनाए हुए हैं। संथाल वर्सेज अन्य आदिवासी की शुरू हुई यह लड़ाई अब कौन सा रूख लेगी यह देखनी की बात होगी क्योंकि भाजपा अपना हाथ आदिवासियों के बीच में डालकर उन्हें नाराज नहीं करना चाहती और यह भी नहीं चाहती कि इसे विपक्षी अस्मिता से जोड़कर उनके खिलाफ प्रयोग कर लें। भाजपा ऐसे में देखो और इंतजार करो की नीति पर चल रही है।

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