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Harish Rana Euthanasia Case: हरीश को इच्छामृत्यु का फैसला सुनाते वक्त भावुक हुए जस्टिस पादरीवाला, मां-बाप ने कहा- अंतहीन दर्द से मुक्त दें

Harish Rana Euthanasia Case: हरीश राणा को इच्छामृत्यु का फैसला सुनाया गया है। फैसला सुनाते वक्त जस्टिस जेबी पादरीवाला भावुक हो गए। पढ़ें पूरी खबर...

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Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

Harish Rana Euthanasia Case: सुप्रीम कोर्ट ने देश में पहली बार बुधवार को 31 वर्षीय युवक हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी। हरीश करीब 13 साल से कोमा की स्थिति में है। उसकी जिंदगी सिर्फ मशीनों और ट्यूबों के सहारे चल रही थी। अब कोर्ट ने उनके पिता की गुहार के बाद जीवन-रक्षक इलाज (लाइफ सपोर्ट सिस्टम) हटाने की इजाजत दे दी।

फैसला सुनाते वक्त भावुक हो गए पादरीवाला

इस फैसले को सुनाते वक्त जस्टिस पादरीवाला भावुक हो गए। उनका गला भर आया। जस्टिस जेबी पादरीवाला ने कहा कि हरीश राणा एक होनहार छात्र थे और पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। मामले की परिस्थितियों का जिक्र करते समय जस्टिस पारदीवाला की आवाज भी भर्रा गई।

उसकी आत्मा तो कब की जा चुकी है: हरीश के मां-पिता

हरीश के पिता अशोक राणा ने कहा कि मैं अपने बेटे का हत्यारा नहीं बनना चाहता, लेकिन उसे इस नरक जैसी जिंदगी में तड़पते हुए भी नहीं देख सकता। हम बूढ़े हो रहे हैं, हमारे बाद उसका क्या होगा? उसे गरिमा के साथ जाने का हक मिलना चाहिए। उसकी मां निर्मला देवी ने कहा कि उसकी आत्मा तो पहले ही जा चुकी है। हम उसे मरते हुए नहीं बल्कि इस अंतहीन दर्द से मुक्त होते हुए देखना चाहते हैं।

बेटे की मौत मांगना आसान नहीं: अशोक राणा

हरीश के पिता अशोक राणा ने बताया कि दिल्ली महावीर एंक्लेव में उनका तीन मंजिला मकान था, जो सितंबर 2021 में बेच दिया। अब और इलाज कराने की आर्थिक क्षमता नहीं रही। उम्र ढल रही है। हमेशा बेटे के साथ नहीं रह सकते। बेटे के लिए मौत मांगना आसान नहीं है, लेकिन हर दिन उसकी मौत नहीं देख पाते। हरीश के पिता चाहते हैं कि हरीश के शरीर के जो अंग काम कर रहे हैं उनको दान कर दूसरों को नया जीवन दिया जाए।

क्या है सक्रिय इच्छामृत्यु

सक्रिय इच्छामृत्यु (एक्टिव यूथेनेशिया) इसमें व्यक्ति की मौत को सक्रिय रूप से जल्दी करने के लिए कदम उठाए जाते हैं, यह भारत में अवैध और आपराधिक माना जाता है। वहीं, निष्क्रिय इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) में जीवन-रक्षक चिकित्सा को हटाया या बंद किया जाता है, ताकि शरीर खुद से काम करना बंद कर दे। यह भारत में वैध है, लेकिन कड़ी शर्तों के साथ, जैसे चिकित्सा बोर्ड की मंजूरी और न्यायालय की निगरानी।

क्या है पूरी कहानी?

हरीश 2013 में बीटेक की पढ़ाई के दौरान रक्षाबंधन के दिन चंडीगढ़ में पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गया था। हादसे में उसे गंभीर चोटें आईं और ब्रेन इंजरी के कारण परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (स्थायी अचेत अवस्था, जिसमें अमूमन आंखें खुली रहती हैं) में चला गया। उसका शरीर पूरी तरह क्वाड्रिप्लेजिक हो गई। पिछले 13 वर्षों में उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। वह लगातार बिस्तर पर रहा, ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब से सांस लेता रहा। पेट में लगी पीईजी ट्यूब के जरिए क्लिनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन (सीएएन) से पोषण दिया जाता रहा। उसे पीजीआइ चंडीगढ़, एम्स, आरएमएल, एलएनजेपी और अपोलो जैसे कई अस्पतालों में दिखाया गया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। उसके शरीर पर बड़े-बड़े बेडसोर हो गए थे और डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि अब रिकवरी की कोई उम्मीद नहीं बची है।