
कांग्रेस नेता के. कामराज। (फोटो- INC official Website)
1962 में मद्रास प्रांत के लिए हुए विधान सभा चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीद से कम था। वैसे पार्टी को बहुमत तो मिल गया था, लेकिन उसे 13 सीटों का नुकसान हुआ था। सीएन अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) 50 सीटें लेकर मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी थी।
| क्रम संख्या / दल (Party) | दल का नाम (Full Name) | लड़ी गईं सीटें (Contested) | जीती गईं सीटें (Won) | जब्त जमानतें (FD - Forfeited Deposits) | कुल प्राप्त मत (Votes Polled) | मत प्रतिशत (Votes % Polled) | लड़ी गई सीटों पर मत % (Vote % in Seats Contested) |
| राष्ट्रीय दल (National Parties) | |||||||
| 1. CPI | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | 68 | 2 | 26 | 9,78,806 | 7.72% | 21.93% |
| 2. INC | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 206 | 139 | 0 | 58,48,974 | 46.14% | 46.14% |
| 3. JS | जनसंघ | 4 | 0 | 4 | 10,743 | 0.08% | 3.56% |
| 4. PSP | प्रजा सोशलिस्ट पार्टी | 21 | 0 | 15 | 1,59,212 | 1.26% | 11.64% |
| 5. SOC | सोशलिस्ट पार्टी | 7 | 1 | 6 | 48,753 | 0.38% | 10.51% |
| 6. SWA | स्वतंत्र पार्टी | 94 | 6 | 59 | 9,91,773 | 7.82% | 17.13% |
| योग (राष्ट्रीय दल) | 400 | 148 | 110 | 80,38,261 | 63.41% | — | |
| राज्य स्तर के दल (State Parties) | |||||||
| 7. DMK | द्रविड़ मुनेत्र कड़गम | 143 | 50 | 11 | 34,35,633 | 27.10% | 39.05% |
| कुल योग (राज्य स्तर के दल) | 143 | 50 | 11 | 34,35,633 | 27.10% | — | |
| पंजीकृत/गैर-मान्यता प्राप्त दल (Registered - Unrecognised) | |||||||
| 8. FB | फॉरवर्ड ब्लॉक | 6 | 3 | 0 | 1,73,261 | 1.37% | 47.45% |
| 9. ML | मुस्लिम लीग | 6 | 0 | 1 | 89,968 | 0.71% | 22.48% |
| 10. REP | रिपब्लिकन पार्टी | 4 | 0 | 1 | 57,457 | 0.45% | 25.93% |
| 11. SL | सोशलिस्ट लेबर | 7 | 0 | 5 | 43,186 | 0.34% | 9.81% |
| 12. TNP | तमिल नेशनल पार्टी | 9 | 0 | 8 | 44,048 | 0.35% | 7.99% |
| 13. WT | वी तमिल्स (We Tamils) | 16 | 0 | 11 | 1,17,640 | 0.93% | 12.56% |
| कुल (गैर-मान्यता प्राप्त दल) | 48 | 3 | 26 | 5,25,560 | 4.15% | — | |
| निर्दलीय (Independents) | |||||||
| 14. IND | निर्दलीय | 207 | 5 | 189 | 6,76,892 | 5.34% | 8.73% |
| कुल (निर्दलीय) | 207 | 5 | 189 | 6,76,892 | 5.34% | — | |
| — | — | — | — | — | — | — | — |
| कुल योग (Grand Total) | 798 | 206 | 336 | 1,26,76,346 | 100.00% | — |
के. कामराज उस समय कांग्रेस के कद्दावर नेता और राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन्हें लगा कि डीएमके सांप्रदायिक राजनीति करके आगे बढ़ रही है और उसकी इस राजनीति को रोकना जरूरी है। उन्हें लगा कि कांग्रेस नेताओं के लिए फिलहाल सबसे जरूरी काम यही है। उन्होंने तय किया कि वह मिसाल पेश करते हुए अपना मुख्यमंत्री का पद छोड़ेंगे और कांग्रेस को अंदर से मजबूत करने के लिए काम करेंगे।
इस बीच दो उपचुनाव हुए और दोनों में कांग्रेस की हार हो गई। एक हार तिरुवन्नामलाई में हुई, जो कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। वहां कामराज ने खुद दस दिन कांग्रेस के लिए प्रचार किया था। इस हार के बाद तो कामराज ने तय कर लिया कि कांग्रेस को मजबूत करना जरूरी है और इसके लिए वह पद छोड़ कर खुद को पूरी तरह पार्टी की मजबूती के लिए समर्पित करेंगे।
तिरुवन्नामलाई की हार का विश्लेषण करने पर कामराज ने पाया कि कांग्रेस जनता से दूर हो रही है और वह जगह डीएमके ले रही है। साथ ही, कांग्रेस में नेतृत्व की कमी और उम्मीदवार चुनने में गलती भी हार की वजह बनी। डीएमके के पास समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज थी और उसका संगठन भी मजबूत था। कामराज कांग्रेस को वैसा ही मजबूत बनाना चाहते थे। वह अपनी इस योजना के साथ जुलाई 1963 में हैदराबाद में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से मिले। उन्होंने उनके सामने मुख्यमंत्री पद छोड़कर पूरी तरह पार्टी की मजबूती के लिए काम करने की अपनी इच्छा रखी।
पंडित नेहरू उनकी दलीलों से बड़े प्रभावित हुए और सोचा कि क्यों न यह योज़ना पूरे देश में अमल में लाई जाए। कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडबल्यूसी) में इस पर चर्चा हुई। सीडबल्यूसी को भी बात पसंद आई। पंडित नेहरू ने कहा कि वह खुद मिसाल पेश करना चाहते हैं और प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ना चाहते हैं। सीडबल्यूसी ने उनकी पेशकश नहीं मानी।
सभी केंद्रीय मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने 'कामराज प्लान' के तहत अपने-अपने इस्तीफे सौंप दिए। पंडित नेहरू ने केवल छह केंद्रीय मंत्रियों के इस्तीफे मंजूर किए। ये थे- मोरारजी देसाई, एसके पाटिल, जगजीवन राम, लाल बहादुर शास्त्री, श्रीमाली और गोपाल रेड्डी। मद्रास, ओड़िसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और कश्मीर के मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे भी स्वीकार किए गए। कहा गया कि 'कामराज प्लान' के बहाने नेहरू ने उन मंत्रियों से पीछा छुड़ा लिया, जिन्हें वे अपनी कैबिनेट में नहीं रखना चाहते थे।
कामराज को पद की कोई लालसा नहीं थी। यह उन्होंने एक बार फिर साबित किया। लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद प्रधानमंत्री चुनने का वक्त आया तो कई कांग्रेसी कामराज के पक्ष में थे। वह चाहते तो आसानी से प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। मोरारजी देसाई ने भी मजबूती से अपनी दावेदारी रखी। कामराज ने उन्हें दौड़ से हट जाने का सुझाव दिया, लेकिन वह माने नहीं। अंततः कांग्रेस संसदीय दल में उनकी हार हुई।
इंदिरा प्रधानमंत्री बनीं। उनके सत्ता में आते ही कांग्रेस की कार्यसंस्कृति बदल गई। 'हाइकमान कल्चर' आ गया। सारी ताकत एक आदमी (इंदिरा) के पास ही आ गई। कांग्रेस मजबूत होने के बजाय बिखर गई। 1969 में पार्टी दो धड़ों में बंट गई। इस बीच कामराज का प्रभुत्व भी कम हो गया था। डीएमके की मजबूती बनी हुई थी। 1967 के मद्रास विधान सभा चुनाव में में डीएमके ने कांग्रेस को हरा दिया था। खुद कामराज भी हार गए थे। 1965 में हिन्दी विरोधी आंदोलन और 1965-66 के अकाल से निपटने में कांग्रेस सरकार बुरी तरह नाकाम रही थी। इसका खामियाजा उसे 1967 के चुनाव में भुगतना पड़ा। 1971 में भी कांग्रेस का हाल बुरा ही रहा।
कामराज 72 वर्ष की आयु में 1975 में दुनिया को अलविदा कह गए। कांग्रेस को मजबूत करने का उनका सपना उनके साथ ही चला गया।
Updated on:
15 Jul 2026 01:14 pm
Published on:
14 Jul 2026 09:02 pm
