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केरल में सिस्टम की कछुआ चाल: 20 साल पहले दी थी सरकारी परीक्षा, 60 पार होने के बाद आया ‘नियुक्ति पत्र’

Kerala PSC: केरल के मलप्पुरम निवासी अब्दुल मजीद को 2005 की भर्ती प्रक्रिया के तहत 2026 में केरल पीएससी से नियुक्ति पत्र मिला, लेकिन 60 वर्ष की आयु सीमा पार हो जाने के कारण उनका सरकारी नौकरी का सपना अधूरा रह गया। यह मामला प्रशासनिक देरी और भर्ती प्रक्रिया की जटिलता को उजागर करता है।
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भारत

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Satya Brat Tripathi

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Updated: 4 Jun 2026, 4:27 AM IST

Jobs

Government Jobs -प्रतीकात्मक तस्वीर


Government job delay: भारत में सरकारी नौकरी पाना करोड़ों युवाओं का सपना होता है, लेकिन जब यह सपना प्रशासनिक सुस्ती के चक्रव्यूह में फंस जाए, तो त्रासदी बन जाता है। केरल के मलप्पुरम जिले के कालिकावू के रहने वाले अब्दुल मजीद के साथ ऐसा ही हुआ है। जब उनकी उम्र 60 पार हो चुकी है, तब उन्हें केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) की तरफ से 'पार्ट-टाइम जूनियर अरबी शिक्षक' के पद पर नियुक्ति के लिए एडवाइस मेमो मिला है। यह नियुक्ति पत्र किसी नई भर्ती का नहीं, बल्कि उस भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें मजीद ने 2005 में भाग लिया था। उस भर्ती की रैंक सूची 2008 तक वैध रही और फिर समाप्त हो गई। मजीद ने भी मान लिया कि अब नौकरी का सपना अधूरा रह गया है।

दो दशक बाद बाद आया बुलावा

अप्रेल 2026 में अचानक पीएससी का एक एडवाइस मेमो उनके घर पहुंचा, जिसने पूरे परिवार को हैरान कर दिया। इसमें उन्हें उसी पद के लिए नियुक्ति की पेशकश की गई थी, जिसके लिए उन्होंने दो दशक पहले परीक्षा दी थी। लेकिन विडंबना यह रही कि 27 मई 2026 को वह 60 वर्ष की आयु पार कर चुके थे, जिसके बाद सरकारी सेवा में प्रवेश का अधिकार नहीं बचता।

सपना पूरा होने से पहले ही टूटा

वर्षों तक पद खाली पड़ा रहा और भर्ती प्रक्रिया को समय पर पूरा नहीं किया गया। इस देरी ने एक योग्य उम्मीदवार को अंतिम अवसर से वंचित कर दिया। मजीद अब किस्मत और सरकारी कागजों के बीच एक आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके दसवीं के प्रमाणपत्र पर उनकी जन्मतिथि 27 मई 1966 दर्ज है। हालांकि, मजीद का दावा है कि उनका वास्तविक जन्म वर्ष 1967 है। अगर यह ठीक हो जाता है तो कम से कम एक साल सरकारी सेवा करने की पात्रता मिल सकता है।

इस घटना ने सरकारी भर्ती प्रणाली की धीमी प्रक्रिया, दस्तावेज सत्यापन की जटिलता और उम्मीदवारों पर इसके मानवीय प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला इस बात की ओर भी इशारा करता है कि कैसे वर्षों तक चलने वाली भर्ती प्रक्रियाएं न केवल उम्मीदवारों का समय बर्बाद करती हैं, बल्कि उनकी उम्र और अवसर दोनों को उनसे छीन लेती हैं।