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दरगाह बनाम मंदिर मामला: हाईकोर्ट का फैसला, याचिकाकर्ता को दीपक जलाने की इजाजत

मदुरै हाई कोर्ट ने थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी के पारंपरिक दीप स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने के अपने पिछले आदेश को बरकरार रखते हुए प्रशासन को इसे लागू करने का निर्देश दिया है।

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भारत

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Devika Chatraj

Jan 06, 2026

तमिलनाडु में स्तंभ पर दीपक जलाने की दी इजाजत (X)

मदुरै हाई कोर्ट ने थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित दीप स्तंभ में कार्तिगई दीपम जलाने से जुड़े अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए प्रशासन को इसे लागू करने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए, साथ ही कानून-व्यवस्था बनाए रखने की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

क्या है मामला?

यह मामला हिंदू तमिल पार्टी के नेता राम रविकुमार द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था। याचिका में मांग की गई थी कि कार्तिगई दीपम पर्व के दिन थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी स्थित पारंपरिक दीप स्तंभ पर दीपम जलाने की अनुमति दी जाए।

पिछले साल आया था अहम आदेश

पिछले वर्ष 1 दिसंबर को मदुरै हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामिनाथन ने याचिका पर सुनवाई करते हुए पर्व के दिन दीपम जलाने की अनुमति दी थी। अदालत ने इसे धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ा विषय मानते हुए आदेश दिया था कि कार्तिगई दीपम जलाया जाए। हालांकि, प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताते हुए इस आदेश को लागू नहीं किया। अधिकारियों का कहना था कि मंदिर और दरगाह से जुड़े विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच विवाद की संभावना है, जिससे शांति भंग हो सकती है।

हाई कोर्ट का सख्त रुख

ताजा सुनवाई में मदुरै हाई कोर्ट ने साफ कहा कि उसका पूर्व आदेश पूरी तरह वैध है और इसे लागू किया जाना चाहिए। अदालत ने दो टूक कहा कि केवल कानून-व्यवस्था की आशंका के आधार पर धार्मिक परंपराओं को रोका नहीं जा सकता। प्रशासन को निर्देश दिए गए कि पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कर दीपम जलाने की परंपरा को निभाया जाए, ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।

क्या है थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी का महत्व?

थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी भगवान मुरुगन के छह पवित्र आश्रयों (अरुपदई वीडु) में से एक है। यहां चट्टान को काटकर बनाया गया एक प्राचीन गुफा मंदिर स्थित है, जो तमिलनाडु ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थल है। इसी पहाड़ी के पास एक दरगाह भी स्थित है। मंदिर और दरगाह के बीच लगभग 3 किलोमीटर की दूरी को लेकर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पहाड़ी के अधिकार और धार्मिक परंपराओं को लेकर तनाव बना रहा है।

क्या था विवाद?

इस पहाड़ी के स्वामित्व को लेकर 1920 में पहली बार कानूनी विवाद सामने आया था। मंदिर और दरगाह, दोनों ने पहाड़ी पर अपने-अपने अधिकार को लेकर अदालत का रुख किया था। एक सिविल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दरगाह से जुड़े कुछ क्षेत्रों को छोड़कर पूरी पहाड़ी सुब्रमण्यस्वामी मंदिर (देवस्थानम) की संपत्ति है। हालांकि, उस फैसले में धार्मिक रीति-रिवाजों, परंपराओं या कार्तिगई दीपम जलाने की परंपरा का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।

दीपम परंपरा को मिली न्यायिक मान्यता

इसके बाद न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामिनाथन ने मंदिर के पवित्र दीप स्तंभ में कार्तिगई दीपम लैंप जलाने की अनुमति देते हुए इसे एक मान्यता प्राप्त धार्मिक परंपरा बताया। अब हाई कोर्ट ने उसी आदेश को दोहराते हुए प्रशासन से इसे सख्ती से लागू करने को कहा है।