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मालेगांव धमाका: आरोपियों पर नरमी बरतने का दबाव डालने का आरोप लगा चुकीं पूर्व SPP ने कहा- रिहाई तय थी

मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में NIA कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है, जिनमें पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल हैं। कोर्ट ने सबूतों की कमी के कारण आरोपियों को बरी किया। यह फैसला 17 साल बाद आया है

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भारत

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Mukul Kumar

Aug 01, 2025

मालेगांव ब्लास्ट। फोटो- IANS

मालेगांव ब्लास्ट के मामले में फैसला आ चुका है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर सहित सभी सातों आरोपियों को बरी कर दिया है। बता दें कि यह बम ब्लास्ट साल 2008 में हुआ था।

मालेगांव विस्फोट मामले की पूर्व विशेष लोक अभियोजक रोहिणी सालियान ने अब जांच और कोर्ट के फैसले को लेकर चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में बताया कि पहले से रिहाई तय थी, उन्हें उम्मीद थी कि यही फैसला सामने आएगा।

रोहिणी ने कहा- पता था ऐसा ही होगा

रोहिणी ने कहा कि ये तो मालूम था कि ऐसा ही होगा। अगर आप सही बात कोर्ट के सामने पेश नहीं करेंगे तो और क्या उम्मीद की जा सकती है? मैं 2017 से इस केस से बाहर थी। तब मैंने कोर्ट के सामने कई सारे सबूत पेश किए थे। उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया था। अब वो सब कहां गायब हो गए?

रोहिणी ने कहा कि वह काफी समय से इस फैसले का इंतजार कर रही थीं। अगर आप पहले जो सबूत दर्ज हुए हैं, उनसे अलग सबूत पेश करेंगे, तो कुछ भी हो सकता है।

उन्होंने कहा कि एनआईए ने बताया था कि पहले के सबूत झूठे थे, यही वजह थी कि उन्होंने फिर से मामले जांच शुरू की थी। इसके बाद गवाहों के बयान दोबारा दर्ज किए गए, जो जाहिर तौर पर एटीएस की तरफ से पहले दर्ज की गई धारा 164 के खिलाफ थे।

नए सबूत वही थे, जो बाद में पेश किए गए

रोहिणी ने कहा कि नए सबूत वही थे जो कोर्ट में बाद में पेश किए गए और फैसला उसी के आधार पर आया है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस फैसले से कोई निराशा नहीं है।

रोहिणी ने कहा कि आजकल कोई यह नहीं चाहता कि सच सामने आए। हम काफी मेहनत करते हैं, लेकिन किसी को यह पसंद नहीं कि ऐसा हो। आखिरकार यह किसकी नाकामी है? यह हमारी अपनी और जनता की नाकामी है।

सरकार की नहीं, क्योंकि जनता ने ही यह सरकार चुनी है। वे अपनी मर्जी से शासन करेंगे। आप किसी भी मामले में सरकार को दोष नहीं दे सकते, खुद को दोष देना होगा।

2015 में नरमी बरतने का लगाया था आरोप

बता दें कि जून 2015 में रोहिणी इस केस की विशेष लोक अभियोजक (सरकारी वकील) थीं। तब उन्होंने बताया था कि जब एनडीए की सरकार सत्ता में आई, तब से ही उन पर आरोपियों के प्रति कोर्ट में 'नरम' रुख रखने का दबाव डाला जा रहा था।

उन्होंने बताया था कि इस मामले में एनआईए के एक अधिकारी ने उन्हें फोन करके बात करने के लिए बुलाया था। वह इस विषय में फोन पर बात नहीं करना चाहते थे।

रोहिणी ने बताया कि अधिकारी ने उनके पास जाकर कहा था कि एक संदेश आया है, जिसमें उन्हें आरोपियों के प्रति नरम रुख रहने को कहा गया है।

इसके बाद जब सत्र न्यायालय में इस मामले की नियमित सुनवाई होनी थी, उसके से ठीक पहले रोहिणी को बताया गया था कि उच्च अधिकारी नहीं चाहते कि वह महाराष्ट्र राज्य की ओर से अदालत में पेश हों। बाद में एनआईए ने उन्हें अपने वकीलों के पैनल से हटा दिया गया।

पहले एटीएस कर रही थी जांच

बता दें कि 2008 में मालेगांव बम धमाका हुआ था। पहले महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वाड इस मामले की जांच कर रही थी, जिसका नेतृत्व तत्कालीन आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे कर रहे थे। इस मामले में पहली गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद 26 नवंबर, 2008 को मुंबई आतंकवादी हमले में करकरे शहीद हो गए।

एटीएस ने जनवरी 2009 में इस मामले की चार्जशीट फाइल की थी। इसमें 11 आरोपियों को नामजद किया गया था। चार्जशीट में दावा किया गया था कि आरोपियों ने फरीदाबाद, उज्जैन, नासिक और भोपाल में बैठकर धमाके की साजिश की थी।

इसमें यह भी बताया कि जो लोग बैठक में शामिल थे, उनमें से कुछ लोगों को गवाह बनाया गया है। उन्होंने मीटिंग में यह सुना था कि आरोपियों को मुस्लिम आबादी वाले इलाके में हमले की योजना बनाने पर जोर देना है।

चार्जशीट में बताया गया कि तीन आरोपियों ने महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत बयान दिया था। इसमें यह भी बताया गया कि आरोपी अभिनव भारत संगठन के जरिए जुड़े थे।

एनआईए की जांच

इसके बाद, यह केस एनआईए के हाथों में चला गया। जांच के बाद 2016 में इसने भी सप्लीमेंट्री चार्जशीट दायर की। इसमें एटीएस की जांच को गलत ठहराया गया था। उसकी आलोचना भी की गई थी।

एनआईए के आरोपपत्र में कहा गया था कि वह घटनास्थल से कोई अतिरिक्त साक्ष्य एकत्र नहीं कर पाई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि देर से यह केस उनके हाथों में आया, इस वजह से भी कोई खास सबूत नहीं मिल पाए।

एनआईए के आरोपपत्र में किसी भी नए गवाह को शामिल नहीं किया गया था, बल्कि 2008-09 में मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत हुए कुछ गवाहों के बयान दोबारा लिए गए, जिन्होंने बाद में अपने पिछले बयानों से इनकार कर दिया था।

एनआईए ने दावा किया कि इस मामले में मकोका नहीं लगाया जा सकता क्योंकि एटीएस ने इस अधिनियम को लागू करने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया था।

एनआईए ने अपनी चार्जशीट में बताया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि विस्फोट से जुड़ी एलएमएल मोटरसाइकिल आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर थी। जबकि एटीएस ने प्रज्ञा को यह दावा करते हुए गिरफ्तार किया था कि उन्होंने धमाके के लिए मोटरसाइकिल उपलब्ध कराई थी। इसके साथ, दो वांछित आरोपियों को अन्य सह-आरोपियों से मिलवाया भी था।

एनआईए ने ठाकुर को आरोपियों की लिस्ट से हटाने तक की की सिफारिश की थी, लेकिन विशेष अदालत ने उन्हें हटाने से इनकार कर दिया और उन्हें मुकदमे का सामना करना पड़ा।

एनआईए ने एटीएस के बयानों में गड़बड़ी का भी दावा किया था। एनआईए ने बताया कि एक गवाह ने जानकारी दी थी कि एटीएस ने मजिस्ट्रेट के सामने गवाही देने के लिए उनसे 'झूठ बोलवाया' था।

एजेंसी की तरफ से गवाह को यह गवाही देने के लिए कहा गया था कि पुरोहित ने उसे 2006 में 18 महीनों तक अपने घर पर तीन हथियार और गोला-बारूद रखने के लिए दिए थे। इसके साथ, हथियारों की डिटेल भी लिखवाई गई थी।

इसके अलावा, उस गवाह से यह भी कहने के लिए कहा गया था कि पुरोहित ने अपने साथियों के साथ मालेगांव विस्फोट की योजना बनाी थी।

बता दें कि जिन गवाहों के बयान फिर से दर्ज किये गये, वे भी उन 39 गवाहों में शामिल थे, जिन्होंने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन नहीं किया और उन्हें पक्षद्रोही घोषित कर दिया गया।