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नीतीश की साइकिल ने बेटियों के पैरों में लगा दिए तरक्की के पहिए, UNO तक हो गई तारीफ!

Nitish bicycle scheme: नीतीश कुमार की साइकिल योजना ने बिहार में महिला साक्षरता दर में बड़े बदलाव किए। पढ़ें इस योजना की सफलता की पूरी कहानी...

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समृद्धि यात्रा के दौरान सीएम नीतीश कुमार

आरा में समृद्धि यात्रा के दौरान सीएम नीतीश कुमार (फोटो- X@JDUOnline)

Nitish bicycle scheme: बिहार की राजनीति में सोमवार 30 मार्च को एक बड़े अध्याय का अंत हो गया। नीतीश कुमार ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। वह करीब 20 साल तक बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे। नीतीश 7 मई 2006 को परिषद के सदस्य बने थे। इसी साल उन्होंने सीएम रहते हुए साइकिल योजना लॉन्च की थी, जो आगे चलकर बिहार की शिक्षा व्यवस्था की नींव बन गई।

कैसे हुई थी साइकिल योजना की शुरुआत

बिहार में बालक-बालिका साइकिल योजना की शुरुआत को लेकर कई कहानियां पटना की सियासी गलियारों में सुनी सुनाई जाती है। बताया जाता है कि साल 2005 के चुनाव में नीतीश कुमार ने बिहार को क्रिमिनल इमेज से क्लीन इमेज बनाने का वादा किया था। लोगों ने उनकी बातों पर भरोसा करते हुए NDA को जिताया। अब सीएम बनने के बाद नीतीश के सामने बिहार को बिमारू राज्य से निकालकर विकसित राज्य के तरफ ले जाने की चुनौती थी। उसी दौरान वह नवबंर महीने में पटना जिले में एक सरकारी समारोह में शिरकत कर रहे थे।

इस समारोह में स्कूल में पढ़ने वाली अनुसूचित जाति की लड़कियों को साइकिल बांटे गए। समारोह के बाद जब लड़कियां कतार में खड़े होकर साइकिल चलाकर जाने लगी तो उसे देख सीएम नीतीश खुश हुए। उन्होंने वहीं अधिकारियों से कहा कि क्यों न इस योजना को बड़े स्तर पर लागू किया जाए और स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों में साइकिल वितरित की जाए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर वर्ष 2006 से इस योजना को पूरे प्रदेश में लागू कर दिया गया।

साल 2007 में 1.63 लाख छात्राओं के बीच बांटे गए साइकिल के पैसे

साल 2007 में नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली 1 लाख 63 हजार छात्राओं को साइकिल खरीदने के लिए पैसे दिए गए थे। दो साल बाद साल 2009 में स्कूलों में नामांकन दर बढ़ने के कारण नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को भी इस योजना का लाभ मिलने लगा।
ये नीतीश के इस योजना का ही कमाल था कि जिस राज्य में 2001 में महिला साक्षरता दर महज 33.6 प्रतिशत थी, वह वर्ष 2011 में बढ़कर 53 प्रतिशत पहुंच गई है। साइकिल योजना के कारण स्कूल ड्रॉप आउट में भी काफी मकी आई।

अभी साइकिल खरीदने के लिए 3 हजार रुपए मिल रहे

शुरुआत में साइकिल खरीदने के लिए 2000 रुपये की राशि दी गई थी। स्कूलों में कैंप लगाकर पैसे बांटे गए। समय के साथ इस व्यवस्था में सुधार किया गया और छात्रों के बैंक खाते में पैसे भेजे जाने लगे। यह राशि डीबीटी के माध्यम से खाते में भेजी जाती है। धीरे-धीरे यह राशि 2000 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये कर दी गई। वर्तमान में यह राशि 2500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये कर दी गई है। इस योजना को लेकर सरकार के मंत्री ने पिछले साल विधानसभा में बताया था कि अमेरिका के एक शिक्षाविद और प्रोफेसर ने भी बिहार सरकार की इस योजना पर रिसर्च किया। अमेरिकी प्रोफेसर्स ने अपनी रिपोर्ट UNO को सौंपी। इसके बाद यूएनओ ने इसे अफ्रीकी देशों के लिए बेहद उपयोगी माना।

अब तक का प्रभाव

●2007 से 2024 तक 97.94 लाख से ज्यादा छात्राओं को लाभ मिला।
●2024-25 में 6.03 लाख लड़कियां और 5.26 लाख लड़के लाभार्थी बने।
●लड़कियों का माध्यमिक शिक्षा में नामांकन 32% बढ़ा।
●लैंगिक अंतर 40% तक कम हुआ।
●आउट-ऑफ-स्कूल लड़कियों की दर 2006 में 17.6% से घटकर 2024 में 2.5% रह गई।
●2012-13 में पहली बार बिहार में लड़कियों का नामांकन लड़कों से ज्यादा हो गया।
●मैट्रिक परीक्षा में बैठने वाली लड़कियों की संख्या 2005 के 1.87 लाख से बढ़कर 2020 में 8.37 लाख हो गई।