
एक कहावत है कि प्यार और जंग में सबकुछ जायज होता है। अब चुनाव भी ऐसा हो गया है। वोटर्स को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दल तरह-तरह की हथकंडे अपना रहे हैं। पार्टियां अब साइकोलोजिक तकनीक का सहारा लेने लगी हैं। इसमें सबसे प्रचलित है एफयूडी या फीयर (भय), अनसर्टेनिटी (अनिश्चितता) और डाउट (संदेह)। दिलचस्प बात यह है कि इसका इस्तेमाल अभियानों और चुनाव से एक-दो दिन पहले होता है ताकि वोटर्स को पक्ष में किया जा सके। एक्सपर्ट्स की मानें तो नेता जब भी कोई विवादित बयान देते हैं तो जरुरी नहीं वह गलती से बोल गये हैं बल्कि यह एक रणनीति का हिस्सा भी होता है।
सोशल मीडिया पर वायरल किए जाते हैं अस्पष्ट कंटेंट
सेंथिल नयागाम बताते हैं कि इसमें अस्पष्ट कंटेंट बनाया जाता है या फिर उस व्यक्ति की तरह आवाज की रिकॉर्डिंग होती है। वीडियो में व्यक्ति पैसा लेते, अनैतिक गतिविधियों में शामिल होता है या फिर मारपीट या हिंसात्मक वीडियो होता है। इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं होता और वोटिंग से एक-दो दिन पहले वॉट्सऐप-टेलीग्राम से वायरल किया जाता है ताकि सोर्स पता नहीं चल पाए। समय इतना कम होता है कि वेरीफाई और कार्रवाई करना संभव नहीं होता है। इसमें गौर करने वाली बात यह होती है कि जब कोई विवादित कंटेंट आता है तो तेजी से वायरल होता है जबकि उसके स्पष्टीकरण पर लोग गौर भी नहीं करते हैं। अनिश्चितता फैलाने पर भी फोकस दूसरा है अनिश्चितता। संंथिल कहते हैं कि संदेश ऐसा होता है कि अगर उनकी पार्टी या प्रत्याशी नहीं जीते तो कुछ भी हो सकता है।
कैसे काम करता है एफयूडी
मुओनियम एआई, चेन्नई के फाउंडर सेंथिल नयागाम का कहना है कि चुनावों में एफयूडी से जुड़ा ज्यादा कंटेंट तैयार किया जा रहा है। इस तरकीब पर लगभग ज्यादातर पार्टी भरोसा कर रही हैं। इसमें पहला एफ- फीयर यानी भय पैदा करना है। इसमें डर पैदा करने वाले कंटेंट देते हैं। इनमें ऐसी बातें शामिल की जाती हैं कि अगर उनकी पार्टी या कैंडिडेट नहीं जीतेगा तो एक वर्ग, जाति, धर्म विशेष को नुकसान हो जाएगा। जैसे कोई विशेष दर्जा, आरक्षण ख़त्म हो जायेगा या उस समूह का अस्तिव खतरे में आ जाएगा। कोई योजना बंद हो जाएगी ताकि वह समूह डरकर उन्हें वोट करे। दूसरा यू-अनसर्टेनिटी यानी अनिश्चितता। इसमें डरने वाली बात नहीं होती लेकिन संदेश ऐसा होता है कि अगर उनकी पार्टी-प्रत्याशी नहीं जीते तो कुछ भी हो सकता है। मन में अनिश्चितता लाने वाली सामग्री होती है। तीसरा अक्षर डी-डाउट यानी संदेह पैदा करने वाले कंटेंट देते हैं कि अगर उनका उम्मीदवार नहीं जीतेगा तो क्या-क्या हो सकता है। संदेह फैलाने पर फोकस होता है। ऐसे में जो पहले से विरोधी दल को वोट देने का मानस बना चुके होते, वे भी एफयूडी कंटेंट देखने के बाद मन बदलकर वोट दे देते हैं। ऐसे कंटेंट से ही ध्रुवीकरण भी किया जा रहा है।
कंटेंट जो वोटर्स में फैलाते हैं डर-संदेह
सेंथिल नयागाम बताते हैं कि इसमें अस्पष्ट कंटेंट बनाया जाता या फिर उस व्यक्ति की तरह आवाज की रिकॉर्डिंग होती है। वीडियो में व्यक्ति पैसा लेते, सेक्सुअल एक्ट (अनैतिक गतिविधि) में शामिल होता या फिर मारपीट या हिंसात्मक वीडियो होता है। ऑडियो कंटेंट में कोई व्यक्ति महिलाओं या किसी समूह को अपशब्द कह रहा होता है। ऑडियो-वीडियो कंटेंट स्थानीय स्थितियों को देखते हुए तैयार किए जाते हैं। इसमें कुछ भी क्लीयर नहीं होता और वोटिंग से एक-दो दिन पहले वॉट्सऐप-टेलीग्राम से वायरल किया जाता ताकि सोर्स पता नहीं चले। समय इतना कम होता है कि वैरीफाई और कार्रवाई संभव नहीं होता है। पुष्टि करने में 2-3 दिन निकल जाते और चुनाव बाद कार्रवाई नहीं होती है। इससे अच्छी छवि वाले व्यक्तियों का चरित्र हनन होने से चुनाव में उसे नुकसान हो जाता है। सेंथिल कहते हैं कि इसमें गौर करने वाली यह होती है कि जब कोई विवादित कंटेंट आता है तो तेजी से वायरल होता है जबकि उसके स्पष्टीकरण पर लोग गौर भी नहीं करते हैं।
समर्थक या डमी व्यक्ति बनते हैं माध्यम
सेंथिल कहते हैं कि फेक न्यूज फैलाने का काम प्रत्याशी नहीं करते हैं। लेकिन उनकी जानकारी में आ जाता है। इस काम को कैंडिडेट के समर्थक या सहयोगी ही अंजाम देते हैं ताकि बाद में पार्टी पर आंच नहीं आए। इसका ज्यादातर काम पार्टी लेवल पर होता है। बड़े खर्चे होते हैं। बड़े स्तर पर कंटेंट तैयार किया जाता है। इसमें कुछ भी कानूनी नहीं होता है इसलिए कंटेंट तैयार करने वाले एक्सपर्ट मेहनताना भी कैश, हवाला या बिटकॉइन में लेते हैं।
Updated on:
13 Apr 2024 09:41 am
Published on:
13 Apr 2024 07:52 am

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