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जन्मशती पर्व श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश: शब्द में संस्कृति का प्रवाह

Karpoor Chandra Kulish: विराट व्यक्तित्व के अनेक स्वरूप... लक्ष्य जनहित, जन सरोकार समाज और संस्कृति संरक्षण से लेकर वेदों तक फैला था विराट मन

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Rajasthan Patrika

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी

Rajasthan Patrika founding editor Karpoor Chandra Kulish: पत्रिका समूह के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी का संपूर्ण व्यक्तित्व सीमाओं और क्षेत्रों में नहीं बांधा जा सकता। एक पथिक की तरह आगे बढ़ते समय जिस ओर दृष्टि पड़ती, वहां वे नई राहें बनाते। स्वतंत्र पत्रकारिता के सिद्धांतों के प्रति अपने नाम कुलिश के अनुरूप कठोर तो जन सरोकार के प्रति उतने ही नरम व संरक्षक। महामना की जन्मशती के मौके पर उनके व्यक्तित्व के पहलू प्रेरणा तो देते ही हैं, उनका अनुसरण ही उन विराट व्यक्तित्व को सच्ची श्रद्धांजलि है…

निर्भीक पत्रकार: न दबाव, न प्रभाव

श्रद्धेय कुलिश जी निर्भीक पत्रकारिता के हिमायती रहे। उनके मन में राजस्थान पत्रिका की स्थापना का बीज ही स्वतंत्र पत्रकारिता की आकांक्षा का प्रकटीकरण था। उन्होंने साबित भी किया कि बिना दबाव व प्रभाव के जन सरोकार की पत्रकारिता ही दीर्घजीवी है। उन्होंने 'पाठक प्रथम' के मूल मंत्र के साथ न केवल पत्रिका को आम जन का अखबार बनाया बल्कि भाषा, शैली, भरोसे के साथ पत्रकारिता के उच्च प्रतिमान कायम किए।

नगरों-गांवों के इतिहासकार

कुलिश जी ने आपातकाल (1975-1977) के दौर में राजस्थान की यात्रा की और 'मैं देखता चला गया' नाम से 150 से अधिक लेख लिखे। कुलिश जी की सोच के कारण पत्रिका में 'आओ गांव चलें स्तम्भ में गांवों की कहानियों और इतिहास को अखबार का हिस्सा बनाया। बरसों चले इस कॉलम से राजस्थान में गांवों का इतिहास लिख दिया गया। ग्रामीणों की बात उन्हीं की शैली में लिखी।

पाठकों का विश्वास सर्वोपरि

खबरों के माध्यम से सनसनी पैदा करके अखबार बढाना और किसी व्यक्ति के विश्वास की रक्षा करना, दोनों की तुलना का सवाल आए तो हर परिस्थिति में विश्वास को मेरी प्रथम वरीयता है।
-कर्पूर चन्द्र कुलिश

संस्कृति संरक्षकः गीत गोविंद के नव-जीवनदाता

कुलिश जी ने 12वीं सदी के महाकवि जयदेव रचित 'गीत गोविंद' पर दूरदर्शन के लिए धारावाहिक रचा। पद्मभूषण और ग्रैमी अवॉर्ड विजेता पं. विश्वमोहन भट्ट और पंडित आलोक भट्ट ने राजस्थान की लोक धुनों पर जयदेव के शब्दों को यादगार स्वरूप दिया। पं.भट्ट ने बाद में कहा कि यह मार्गदर्शन उनके लिए गुरु-दर्शन जैसा था। 1977 में जयपुर की स्थापना के 250 साल पूरे होने पर 'अढाई शती समारोह' मनाने की कल्पना से लेकर उसके कार्यक्रमों में कुलिश जी की प्रमुख भूमिका रही।

साहित्यकार : हिंदी के साथ मातृभाषा में अनूठा लेखन

कुलिश जी पत्रकार के रूप में जितने तीखे थे, रचनात्मक व आत्मकथ्यात्मक लेखन में उतने ही प्रयोगवादी व सिद्धहस्त। उनकी प्रमुख रचनाएं मैं देखता चला गया, 'अमरीका एक विहंगम दृष्टिं और आत्मकथा 'धाराप्रवाह' इसकी मिसाल हैं। उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन ने 'साहित्य रत्न' से सम्मानित किया। उनका मातृभाषा ढूंढाड़ी से विशेष लगाव था। कुलिश जी ने ढूंढाड़ी भाषा में 700 दोहे लिखे, जो 'सात सैकड़ा' किताब में संकलित है। पत्रिका में व्यंग्यात्मक कॉलम 'पोलमपोल' लोकप्रिय रहा। वे मानते थे-स्थानीय भाषा में लिखना लोगों के दिल तक पहुंचने का सबसे सीधा रास्ता है।

वेद विज्ञानीः प्राचीन ज्ञान में आधुनिक विज्ञान

बाहर से कर्मठ पत्रकार और भीतर से गहरे आध्यात्मिक इंसान। नूतन-पुरातन के संगम के रूप में कुलिश जी ने वेद में वैज्ञानिक तत्व यानी वेद विज्ञान को नए रूप में प्रस्तुत किया। 'वेद एज साइंस' और 'वेद-विद्या प्रवेशिका' जैसी पुस्तकों में कुलिश जी ने वेदों की वैज्ञानिक व्याख्या की। चारों वेदों की 11 संहिताओं का संकलन 'शब्द वेद' में किया, जो दुर्लभ कार्य माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उनकी पुस्तकों को सराहने वालों में शामिल हैं। वेदों पर अध्ययन से प्रभावित महर्षि संदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन ने कुलिश जी को सम्मानित किया।

जन सरोकारीः जल से जीव तक संरक्षण

कुलिश जी ने पत्रिका के माध्यम से जल संरक्षण, पौधरोपण और पर्यावरण जागरूकता के कई अभियान चलाए। गांवों की यात्राओं में सूखती नदियों और घटते जंगलों को दर्ज किया। अकाल के दौरान चलाए गए एक मुट्ठी अनाज' अभियान में लाखों लोग जुड़े। पर्यावरण संरक्षण का हरियाळो राजस्थान अभियान व जल संरक्षण अभियान जन आंदोलन बन गया। भूकंप पीड़ितों को मदद का मामला हो या करगिल युद्ध के बाद शहीद परिवारों का संरक्षण, कुलिश जी के जन सरोकार के कार्य मिसाल बने। राजस्थान में गोडावण संरक्षण भी उनकी दूरगामी सोच का उदाहरण है।

प्रगतिवादी: परंपरा व रूढ़ियों में भेद

कुलिश जी परंपराओं और प्रगतिवादी सोच के संगम थे। उन्होंने अपने लेखन व पत्रकारिता में परंपरा व रुढ़ियों में भेद किया। ऐसे दौर में जब कई गांवों में महिलाएं घूंघट से बाहर नहीं आती थीं, कुलिश जी ने पत्रिका में उनकी आवाज को मंच दिया और काम के लिए अवसर भी उपलब्ध करवाए। महिलाओं से जुड़े बाल विवाह, महिला शिक्षा, दहेज प्रथा, घूंघट प्रथा जैसे मुद्दों को लगातार उठाया। कई अभियानों में महिलाओं को बराबर की भागीदार बनाया। दूसरी ओर वे समाज, परिवार व विवाह जैसी संस्थाओं के पारंपरिक सकारात्मक मूल्यों के प्रति हमेशा सजग रहे और उनके संरक्षण को अपने लेखन का विषय बनाया।