5 अगस्त 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

शहरों के सीवेज से प्रदूषित हो रहीं नदियां-झीलें, सिर्फ 28% गंदे पानी का ही हो रहा उपचार

Rivers-Lakes Being Polluted: देश की नदियों और झीलों में शहरों के सीवेज की वजह से प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। यह चिंताजनक स्थिति है।
2 min read
Google source verification

भारत

image

Tanay Mishra

Aug 06, 2026

Urban sewage in river

शहरों के सीवेज से प्रदूषित हो रहीं नदियां-झीलें (File Photo)

देश के शहरों से हर दिन निकलने वाला लाखों लीटर बिना उपचार का सीवेज नदियों, झीलों और तालाबों को तेज़ी से प्रदूषित कर रहा है। संसद की शहरी विकास संबंधी स्थायी समिति ने इसे गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बताते हुए कहा है कि देश में प्रतिदिन 72,368 मिलियन लीटर (एमएलडी) शहरी सीवेज पैदा होता है, लेकिन इसमें से सिर्फ 20,236 एमएलडी यानी करीब 28% का ही उपचार हो पाता है। शेष 72% सीवेज बिना शोधन सीधे नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों में पहुंच रहा है। यह चिंताजनक स्थिति है।

जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा

समिति ने कहा कि यह केवल सीवेज निस्तारण की समस्या नहीं, बल्कि देश की जल सुरक्षा, जैव विविधता और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा है। इस सीवेज के जल स्रोतों में पहुंचने से जैविक प्रदूषण बढ़ रहा है, घुलित ऑक्सीज़न का स्तर घट रहा है और मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। कई जलाशयों में शैवाल (एल्गी) की अत्यधिक वृद्धि, दुर्गंध और पानी की गुणवत्ता में गिरावट भी इसी का परिणाम है। यही प्रदूषित पानी सिंचाई, भूजल पुनर्भरण और कई शहरों के पेयजल स्रोतों को भी प्रभावित कर रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में दर्जनों प्रदूषित नदी खंड पहले ही चिह्नित कर चुका है, जिनमें शहरी सीवेज प्रदूषण प्रमुख कारणों में शामिल है।

77% शहरों में सीवरेज नेटवर्क मौजूद लेकिन…

समिति के अनुसार देश के 77% शहरों में सीवरेज नेटवर्क मौजूद है, लेकिन सिर्फ 44% शहरी परिवार ही उससे जुड़े हैं। वहीं देश में 409 लाख सीवर और सेप्टेज कनेक्शनों की जरूरत आंकी गई थी। इसके मुकाबले 211 लाख कनेक्शनों की परियोजनाएं ही स्वीकृत हुईं और अब तक करीब 192 लाख कनेक्शन ही उपलब्ध कराए जा सके हैं।

भारी खर्चे के बावजूद अधूरा लक्ष्य

रिपोर्ट के मुताबिक अमृत मिशन के पहले चरण में सीवरेज एवं सेप्टेज प्रबंधन पर 32,456 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए, जो कुल परियोजना लागत का 42% है। लक्ष्य शहरी क्षेत्रों में सीवरेज कवरेज 31% से बढ़ाकर 62% करना था। वहीं अमृत 2.0 के तहत 500 शहरों में 584 परियोजनाएं मंजूर हुई हैं, जिनकी लागत 65,625 करोड़ रुपए है। योजना की अवधि मार्च 2027 तक बढ़ा दी गई है। भारी खर्चे के बावजूद लक्ष्य अधूरा है।

आधा भी नहीं बिछ पाया सीवर नेटवर्क

अमृत और अमृत 2.0 के तहत 59,261.67 किलोमीटर सीवर नेटवर्क स्वीकृत हुआ, लेकिन अब तक सिर्फ 27,418.87 किलोमीटर ही बिछ पाया है। इसके अलावा 13,114.38 एमएलडी क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और 2,499.67 केएलडी क्षमता के फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) मंजूर किए गए हैं। फिलहाल करीब 7.4 करोड़ शहरी परिवार सीवरेज एवं सेप्टेज सेवाओं से जुड़े हैं।

फंड जारी करने की रफ्तार भी धीमी

रिपोर्ट के मुताबिक सीवरेज और सेप्टेज प्रबंधन के लिए 66,059.53 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता स्वीकृत हुई, लेकिन अब तक 22,762.99 करोड़ रुपए यानी 34.46% राशि ही जारी की गई है। समिति ने टेंडर, भूमि अधिग्रहण, मंजूरियों में देरी, ठेकेदारों की समस्याओं और शहरी निकायों की सीमित तकनीकी क्षमता को परियोजनाओं में देरी का प्रमुख कारण बताया है।

ट्रीटेड पानी के दोबारा इस्तेमाल पर जोर

देश में फिलहाल 6,012 एमएलडी उपचारित पानी का फिर से इस्तेमाल हो रहा है, जबकि इसकी क्षमता कहीं ज़्यादा है। समिति ने उपचारित पानी के अधिकतम उपयोग, जीआईएस आधारित योजना, डिजिटल मॉनिटरिंग और शहरी निकायों की क्षमता बढ़ाने की सिफारिश की है।