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POCSO कानून में आएगा ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज! सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, अब किशोर प्रेमियों को नहीं होगी जेल?

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में निर्देश दिए कि पोक्सो कानून के दुरुपयोग को रोकने के पर्याप्त कानूनी प्रावधान किए जाने चाहिए वहीं वास्तविक किशोर संबंधों को छूट देने के लिए इसमें रोमियो-जूलियट खंड जोड़ा जाना चाहिए।

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प्रतीकात्मक फोटो

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई और केंद्र सरकार से इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। अदालत ने निर्देश दिया कि कानून में एक 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' जोड़ा जाए, ताकि किशोरावस्था में आपसी सहमति से बने वास्तविक प्रेम संबंधों को इस कठोर कानून की जकड़न से मुक्ति मिल सके।

ताकि युवाओं का भविष्य बर्बाद ना हो

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शुक्रवार को कहा, 'POCSO कानून आज के बच्चों और कल के नेताओं की रक्षा के लिए न्याय की सबसे गंभीर और पवित्र अभिव्यक्ति है।' लेकिन अदालत ने माना कि कई मामलों में यह कानून बदले की भावना से इस्तेमाल हो रहा है, खासकर ऐसे प्रेम संबंधों में जहां दोनों पक्ष किशोर हैं और उम्र में मामूली अंतर है। ऐसे में परिवारों द्वारा विरोध जताने पर लड़के पर POCSO के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाता है, जिससे युवाओं का भविष्य बर्बाद हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिए ये सुझाव

पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बार-बार न्यायिक संज्ञान लेने के बावजूद दुरुपयोग जारी है। इसलिए फैसले की प्रति केंद्रीय विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि वे निम्नलिखित कदमों पर विचार करें:
— 'रोमियो-जूलियट क्लॉज' की शुरुआत, जो सहमति वाले वास्तविक किशोर संबंधों को कानून की कठोर धाराओं से छूट दे।
—उन लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने का प्रावधान, जो कानून का दुरुपयोग कर बदला लेते हैं।
यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ अपील के निस्तारण के दौरान आई।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया हाईकोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट ने एक POCSO मामले में आरोपी को जमानत देते हुए निर्देश दिए थे कि हर मामले में पीड़िता की उम्र का मेडिकल निर्धारण अनिवार्य हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्देश को खारिज कर दिया और कहा कि उम्र का निर्धारण ट्रायल का विषय है, न कि जमानत सुनवाई का। हालांकि, जमानत को बरकरार रखा गया।

वकीलों से भी खास अपील

अदालत ने वकीलों से भी अपील की कि वे फर्जी या बदले की भावना से दायर मुकदमों के खिलाफ गेटकीपर की भूमिका निभाएं, क्योंकि इससे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कम होता है।


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