
Why did Mahatma Gandhi disillusioned with life
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज पुण्यतिथि है। 30 जनवरी 1948 को ही महात्मा गांधी ने आखिरी सांस ली थी। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। परंतु क्या आपको पता है महात्मा गांधी सवा सौ साल तक जीना चाहते थे? हाँ ये बात खुद राष्ट्रपिता ने ही अपने आखिरी जन्मदिन 2 अक्टूबर, 1947 को कहा था। महात्मा गांधी ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था, "मैंने अब ज्यादा जीने की इच्छा छोड़ दी है। मैंने कभी कहा था कि सवा सौ साल तक जिंदा रहूं, लेकिन अब मेरी कोई सुनता नहीं। मैं इतने दिनों से दिल्ली में दंगों को रुकवाने की कोशिश कर रहा हूँ पर दंगे रुक नहीं रहे।" ये शब्द महात्मा गांधी ने सरदार पटेल और उनकी पुत्री मणिबेन पटेल से तब कही थी जब ये दोनों उनसे मिलने के लिए बिड़ला हाउस पहुंचे थे।
'Gandhi's Delhi' किताब के अनुसार 9 सितंबर 1947 को दिल्ली के शाहदरा रेलवे स्टेशन से उन्हें तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर वापस ले जाने आए थे।
दरअसल, आजादी के बाद देश में जो बंटवारा हुआ था उसने राजधानी दिल्ली को काफी प्रभावित किया। यहाँ दंगों ने प्रभावी रूप ले लिया। पहाड़गंज, करोलबाग, दरियागंज, महरौली जैसे इलाके दंगों की आग में जल रहे थे। इसलिए पटेल उन्हें सुरक्षित क्षेत्र में ले जाना चाहते थे।
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तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल के साथ महात्मा गांधी बिड़ला हाउस जाने के लिए तैयार हुए और जब वो जाने लगे तो उन्होंने इस दौरान दिल्ली को जलते देखा। महात्मा गांधी को समझ आ गया कि स्थिति काफी गंभीर हो चुकी है।
महात्मा गांधी 14 सितंबर को दंगों की आग में झुलस रहे ईदगाह और मोतियाखान पहुंचे। ये सब महात्मा गांधी ने कहा कि 'भारत में मुसलमानों को रहने का हक है। ये सुन उस समय पाकिस्तान में अपना सब कुछ खोकर आए हिंदू और सिख शरणार्थी हैरान हो गए थे।
महात्मा गांधी के लगातार प्रयासों के बावजूद दिल्ली में दंगे थम नहीं थे। 12 जनवरी को महरौली में कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को भी दंगों में भारी नुकसान पहुंचा था। ये सब महात्मा गांधी ने 13 जनवरी 1948 को अनिश्चितकाल के लिए उपवास की घोषणा कर दी।
कहा जाता है कि ये उपवास महात्मा गांधी ने भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया था ताकि भारत सरकार पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दे दे। ये उपवास महात्मा गांधी के लिए अंतिम उपवास साबित हुआ था।
हालांकि, राष्ट्रपिता के उपवास का प्रभाव दिखाई देने लगा नेहरू पटेल समेत सभी ने बिड़ला हाउस में डेरा जमा लिया था। संकड़ों की संख्या में हिन्दू, मुसलमान और सिख भी महात्मा गांधी से उपवास तोड़ने का आग्रह करने लगे।
उनके उपवास का प्रभाव दिखा और दिल्ली शांत हो गई। इसके बाद 18 जनवरी को महात्मा गांधी ने अपना उपवास तोड़ा था।
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Published on:
30 Jan 2022 10:05 am
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