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लद्दाख को लेकर केंद्र के प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं सोनम वांगचुक, अब 22 अक्टूबर की बैठक पर नजर

Ladakh News: लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग पर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों की वार्ता में गतिरोध। सोनम वांगचुक ने बातचीत को असंतोषजनक बताया। अब सभी की नजर संशोधित प्रस्ताव और 22 अक्टूबर को होने वाली अगली बैठक पर है। पढ़ें पूरी खबर...
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लेह

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Pratiksha Gupta

•

Oct 16, 2026

Sonam Wangchuk news

सोनम वांगचुक(फोटो-ANI)

Sonam Wangchuk: लद्दाख को संवैधानिक अधिकार देने और लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना को लेकर केंद्र सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच बातचीत में अब तक सहमति नहीं बन पाई है। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गृह मंत्रालय के साथ हालिया बैठक के बाद कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, विधानसभा और उससे जुड़े सुरक्षा उपायों पर दोनों पक्षों के बीच बड़ा अंतर है। हालांकि, उन्होंने इसे पूरी तरह से वार्ता की विफलता मानने से इनकार करते हुए उम्मीद जताई कि केंद्र का नया मसौदा कुछ सकारात्मक बदलाव लाएगा। वहीं अगली बैठक 22 अक्टूबर को दिल्ली में प्रस्तावित है।

बातचीत का नतीजा उम्मीद के मुताबिक नहीं

लेह में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सोनम वांगचुक ने बताया कि हालिया दौर की वार्ता का परिणाम लद्दाख के निवासियों के लिए मनमुताबिक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि बैठक में जिस प्रकार का रुख देखा गया, उससे स्थानीय लोगों में निराशा है। वांगचुक ने बताया कि वार्ता में मतभेद उभरकर सामने आए हैं। फिलहाल सरकार ने एक संशोधित मसौदा प्रस्ताव देने का वादा किया है। जब तक वह मसौदा हमारे सामने नहीं आता, तब तक हम इसे विफलता नहीं बल्कि बातचीत का एक चरण मान रहे हैं। हमें उम्मीद है कि 22 तारीख को नई दिल्ली में होने वाली अगली बैठक में स्थिति स्पष्ट होगी।

क्यों अटका है लद्दाख का मुद्दा?

लद्दाख के लोग अपने इलाके को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244) के तहत अधिकार देने की मांग कर रहे हैं, ताकि उनकी जमीन और नौकरियां सुरक्षित रह सकें। वहीं, केंद्र सरकार लद्दाख को पूर्ण राज्य बनाने के बजाय अनुच्छेद 371 के तहत कुछ विशेष अधिकार देना चाहती है। सोनम वांगचुक का कहना है कि बिना चुनी हुई विधानसभा के अनुच्छेद 371 का फायदा जनता तक नहीं पहुंच सकता। फिलहाल लद्दाख में पूरा शासन अफसरशाही और उपराज्यपाल के हाथ में है, जिससे स्थानीय लोग असंतुष्ट हैं।

क्या है 'हाइब्रिड विधानसभा मॉडल'?

लद्दाख के पास फिलहाल इतना बजट या कमाई नहीं है कि वह पूरे राज्य का खर्च उठा सके और सरकारी कर्मचारियों को वेतन दे सके। इस समस्या का हल निकालने के लिए लद्दाख के नेताओं ने सरकार के सामने 'हाइब्रिड विधानसभा मॉडल' का रास्ता रखा है:

  • विधायी शक्तियां: लद्दाख को कानून बनाने की लोकतांत्रिक शक्ति दी जाए, जिससे क्षेत्र की जमीन और नौकरियों की सुरक्षा हो सकें।
  • कम वित्तीय बोझ: जब तक लद्दाख आत्मनिर्भर नहीं हो जाता, तब तक इसे पूर्ण राज्य का भारी वित्तीय बोझ न दिया जाए।
  • जनता के प्रति जवाबदेही: शासन में नौकरशाही सीधे उपराज्यपाल के बजाय जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी हो, ताकि लेह और कारगिल की जनता की बात सीधे शासन में सुनी जा सकें।

22 तारीख की दिल्ली बैठक पर नजरें

स्थानीय प्रतिनिधियों का मानना है कि लद्दाख की सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और रणनीतिक संवेदनशीलता को देखते हुए इसे नौकरशाही के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अब सभी की निगाहें गृह मंत्रालय द्वारा सौंपे जाने वाले संशोधित मसौदे और 22 तारीख को दिल्ली में होने वाले अगले दौर की वार्ता पर टिकी हैं।