
Supreme Court (Photo - ANI)
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सबरीमला मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य पुजारी पक्ष से अहम सवाल पूछा। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अगर किसी श्रद्धालु को जन्म, सामाजिक स्थिति या किसी जन्मजात कारण के आधार पर भगवान की प्रतिमा को छूने से रोका जाता है, तो क्या वह व्यक्ति संविधान के तहत संरक्षण नहीं मांग सकता? सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई में 9 जजों की संविधान बेंच इस बात पर विचार कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है और किस हद तक परंपरागत प्रथाओं को कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। समीक्षा याचिका दायर करने वाले मुख्य पुजारी की ओर से वकील वी. गिरी ने कहा कि पूजा-पद्धति, अनुष्ठान और धार्मिक रीति-रिवाज धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं। मंदिर में होने वाली परंपराएं देवता के स्वरूप और उनकी विशेषताओं के अनुरूप तय की जाती हैं, जिन्हें श्रद्धालुओं को अपनी आस्था के हिस्से के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
जस्टिस अमानुल्ला: क्या कोई अत्यंत श्रद्धालु भक्त सिर्फ जन्म या किसी अन्य कारण से भगवान तक सीधे पहुंच से वंचित किया जाता है, तो यह समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा नहीं है?
वकील गिरी: सिर्फ जन्म ही किसी व्यक्ति के अर्चक बनने के लिए अयोग्यता का कारण है, तो यह गलत और अमान्य होगा।
जस्टिस नागरत्ना: किसी विशेष देवता से जुड़ी कोई प्रथा या विशेष आगम के तहत केवल कुछ योग्य व्यक्ति ही वह पूजा कर सकते हैं। जैसे कुछ शिव मंदिरों में आप शिवलिंग पर जल नहीं चढ़ा सकते तो इसका अस्पृश्यता से सीधा कोई संबंध नहीं है?
वकील गिरी: जो प्रतिबंध धर्म की मूल और आवश्यक परंपराओं से जुड़े हैं, उन्हें मान्यता दी जा सकती है।
जस्टिस प्रसन्ना: क्या एक आस्तिक, जिसे नई तकनीकों और दर्शनों का ज्ञान है, कुछ सदियों पुरानी प्रथाओं पर सवाल उठा सकता है?
जस्टिस जॉयमाल्य बागची: क्या किसी संप्रदाय के सदस्य के लिए संप्रदाय की कुछ प्रथाओं पर सवाल उठाना उचित है? तो न्यायालय की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?
वकील गिरी: किसी आस्तिक के लिए विभिन्न संप्रदायों की प्रथाओं पर सवाल उठाना उचित नहीं है, क्योंकि इसका अर्थ होगा कि उसमें कोई विश्वास नहीं है। हालांकि यह उन लोगों को तर्कहीन लग सकता है जो धार्मिक विश्वास नहीं करते। संप्रदाय का दृष्टिकोण ही सर्वोपरि होना चाहिए।
Updated on:
22 Apr 2026 07:07 am
Published on:
22 Apr 2026 07:06 am
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