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‘काश जजों की नियुक्ति भी इतनी तेजी से होती’, चुनाव आयुक्तों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

EC Appointment Row: Supreme Court of India ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर सरकरों पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि लगातार आने वाली सरकारें चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्र कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाने में विफल रही हैं।
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भारत

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Satya Brat Tripathi

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Updated: 7 May 2026, 9:14 PM IST

NEET Paper Leak Row

NEET Paper Leak Row : NEET विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की दोटूक, केंद्र सरकार से मांगा जवाब ( Photo ANI)

Supreme Court on CEC Appointment: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सरकारों द्वारा भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के स्वतंत्र कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए कानून पारित करने में विफलता पर बेहद तल्ख टिप्पणी की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पूछा, 'बारनवाल (फैसले) से पहले संसद ने कानून क्यों नहीं बनाया?

दरअसल, अदालत 2023 के अनूप बारनवाल बनाम भारत संघ मामले के फैसले का जिक्र कर रही थी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को शामिल किया गया था।

इस पर प्रशांत भूषण ने कहा कि हर सरकार ने कानून की अनुपस्थिति का फायदा उठाया ताकि चुनाव आयोग की नियुक्तियों को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने कहा, 'क्योंकि हर सरकार ने इसका फायदा उठाया, ताकि नियुक्तियों का दुरुपयोग किया जा सके। जब लोग विपक्ष में होते हैं तो स्वतंत्र संस्था की मांग करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे भूल जाते हैं।'

इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा, 'बहुमत की तानाशाही। जो भी सत्ता में आता है, वही कर रहा है। यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। मैंने डॉ. आंबेडकर पर BBC की एक वीडियो देखी थी। संविधान लागू होने के तीन साल के भीतर उन्होंने कहा था कि इस देश में लोकतंत्र काम नहीं कर रहा।'

याचिका में CJI को चयन प्रक्रिया से बाहर करने का विरोध

यह याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को चुनौती देती है। इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक चयन समिति द्वारा की जाती है, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के खिलाफ है, क्योंकि इसमें चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र व्यवस्था नहीं है। याचिका में कहा गया कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट के अनूप बारनवाल फैसले का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें CJI को चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इससे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर किया गया है क्योंकि प्रधानमंत्री और उनके नामित सदस्य का हमेशा प्रभाव रहेगा। सुनवाई की शुरुआत में अदालत ने कहा कि अनूप बारनवाल फैसले में बनाई गई व्यवस्था केवल अंतरिम व्यवस्था थी, जब तक संसद कानून नहीं बना देती।

पीठ ने कहा, 'अनूप बारनवाल फैसला अंतरिम अवधि के लिए था, जब तक संसद कानून न बना दे। क्या फैसले में कहीं कहा गया था कि संसद कानून बनाते समय हमारी टिप्पणियों को ध्यान में रखे? CJI की समिति में मौजूदगी केवल तब तक थी जब तक कोई कानून नहीं था।'

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने कहा, 'लेकिन यही संवैधानिक व्यवस्था है। हम यह नहीं कह रहे कि अदालत कानून बनाए, लेकिन जब कानून बनता है तो अदालत यह जांच सकती है कि वह संवैधानिक मानकों के अनुरूप है या नहीं। बारनवाल फैसला सिर्फ समिति की संरचना तक सीमित नहीं था, उसने संवैधानिक आवश्यकता भी बताई थी।'

विपक्षी सांसदों के निलंबन का मुद्दा भी उठा

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने कहा कि जब यह विधेयक संसद में पारित हुआ, तब विपक्ष के 141 सांसद निलंबित थे। प्रशांत भूषण ने दावा किया कि कानून बिना सार्थक बहस के ‘वॉयस वोट’ से पारित किया गया। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा, 'स्वतंत्र चुनाव आयोग के बिना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं।' लोकतंत्र का भविष्य इसी मामले पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 14 मई को करेगा।

न्यायाधीशों की नियुक्ति का भी जिक्र

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की नियुक्ति का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जिस तेजी से की गई, काश उसी तरह न्यायाधीशों की नियुक्तियां भी होतीं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में दो नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जल्दबाजी में की। उनका दावा था कि सरकार को पता था कि अगले दिन सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई करने वाला है, इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया तेजी से पूरी की गई।

इस पर अदालत ने कहा, 'हम सिर्फ इतना कह सकते हैं कि काश न्यायाधीशों की नियुक्ति में भी यही तेजी बनी रहती। चुनाव आयुक्त सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर होते हैं।' पीठ की यह टिप्पणी उस समय आई जब अदालत नियुक्ति प्रक्रिया की समयसीमा और चयन समिति की कार्यप्रणाली पर सवालों पर विचार कर रही थी।