
कोर्ट। (फाइल फोटो- पत्रिका)
सोचिए, एक आदमी बैंक मैनेजर है, हर महीने एक लाख से ज्यादा कमाता है, लेकिन अलग रह रही पत्नी को गुजारा भत्ता देने की बात आती है तो कहता है-EMI भरनी है, लोन चुकाना है, पैसे नहीं हैं।'
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही एक सोच पर इस हफ्ते जोरदार तमाचा जड़ा और साफ कह दिया कि घर-गाड़ी के लिए ईएमआई भरना पत्नी के गुजारे से बड़ा नहीं हो सकता।
उत्तराखंड की दीपा जोशी और गौरव जोशी के बीच शादी के कुछ समय बाद ही तलाक हो गया। दीपा के पास कोई नौकरी नहीं, कोई कमाई नहीं। उन्होंने भरण-पोषण के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
फैमिली कोर्ट ने 8,000 रुपये महीना तय किया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 15,000 किया। दीपा को यह भी नाकाफी लगा और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पति गौरव जोशी कनारा बैंक में मैनेजर हैं और उनकी ग्रॉस सैलरी 1,15,670 रुपये महीना है। उनकी दलील थी कि लोन की किश्तें, तमाम कटौतियां निकालने के बाद हाथ में बहुत कम बचता है। निचली अदालतों ने भी इसी आधार पर गुजारा भत्ता कम रखा था।
लेकिन जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस तर्क को सिरे से नकार दिया। कोर्ट ने कहा कि लोन चुकाने से संपत्ति बनती है, यह कोई मजबूरी का खर्च नहीं है बल्कि यह तो पूंजी निवेश है। ऐसे में यह पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बड़ा नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक बहुत जरूरी बात कही जो हर उस महिला के लिए राहत की बात है जो इस तरह की लड़ाई लड़ रही है।
कोर्ट ने कहा कि पति का पत्नी को गुजारा भत्ता देना एक बुनियादी और लगातार चलने वाली जिम्मेदारी है और यह इस तरह दिया जाना चाहिए कि पत्नी सम्मान के साथ जी सके।
कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजारा भत्ता कागजी नहीं होना चाहिए, यानी इतना कम नहीं कि बस नाम के लिए हो। यह उचित, न्यायसंगत और दोनों पक्षों की हैसियत के हिसाब से होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजारा भत्ता बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति महीना कर दिया। साथ ही यह भी आदेश दिया कि जितना बकाया है वह तीन महीने के अंदर चुकाया जाए और हर महीने की 7 तारीख तक भत्ता दिया जाए। यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 144 के तहत दायर किया गया था।
भारत में लाखों ऐसी महिलाएं हैं जो घरेलू कलह के बाद अदालत में गुजारा भत्ते की लड़ाई लड़ती हैं और पति की EMI और लोन की दलीलों के आगे उनका हक दब जाता है।
यह फैसला उन सभी के लिए एक मजबूत नजीर है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रॉपर्टी बनाने की चाहत, पत्नी के पेट भरने की जिम्मेदारी से बड़ी नहीं हो सकती।
Updated on:
18 Apr 2026 04:47 pm
Published on:
18 Apr 2026 04:46 pm
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