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UCC ‘संवैधानिक लक्ष्य’ है, इसका किसी धर्म से संबंध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। इस मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट UCC (Uniform Civil Code) का स्पष्ट अर्थ बताया है।
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भारत

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Vinay Shakya

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Updated: 18 Apr 2026, 4:48 AM IST

supreme Court

सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि समान नागरिक संहिता (UCC) संवैधानिक लक्ष्य है और इसका किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है। इस मामले पर CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करके जवाब मांगा।

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े शरीयत कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर समान नागरिक संहिता (UCC) का स्पष्ट अर्थ समझाया है। साफ कहा है कि समान नागरिक संहिता का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है, यह संवैधानिक लक्ष्य है। यह याचिका अधिवक्ता पौलोमी पावनी शुक्ला और 'न्याय नारी फाउंडेशन' की ओर से दायर की गई है।

मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों से कम हिस्सा मिलना स्पष्ट भेदभाव

अधिवक्ता पौलोमी पावनी शुक्ला और 'न्याय नारी फाउंडेशन' की ओर से दायर याचिक पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि सिविल कानून सभी धर्मों के लिए समान होना चाहिए और उत्तराधिकार जैसे मुद्दे धार्मिक नहीं, बल्कि सिविल प्रकृति के हैं। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में आधा या उससे कम हिस्सा मिलना स्पष्ट भेदभाव है। भूषण ने यह भी कहा कि मुस्लिम उत्तराधिकार कानून कोडिफाइड नहीं है और नियम इतने जटिल हैं कि वकीलों के लिए भी समझना कठिन है।

प्रशांत भूषण ने UCC को लेकर समुदाय में मौजूद आशंकाओं का जिक्र करते हुए कहा कि इसे किसी धर्म विशेष से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जैसे कानून पहले से ही समानता की दिशा में कदम हैं, लेकिन यह भी सवाल है कि ऐसे मुद्दों में अदालत या विधायिका दखल दे। कोर्ट ने इस याचिका को अन्य समान मामलों के साथ जोड़ दिया।

विरासत धार्मिक प्रथा नहीं, भेदभाव खत्म करना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि विरासत आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। यह अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं हो सकती है। उन्होंने बताया कि मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई ही वसीयत कर सकता है, जिससे स्वअर्जित संपत्ति पर भी पूरा अधिकार नहीं रहता। कोर्ट ने माना कि यदि कोई प्रथा स्वभाव से भेदभावपूर्ण है तो उसे खत्म किया जा सकता है। इस संबंध में कोर्ट ने केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।

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