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अरावली में अवैध खनन पर BJP सरकार को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार, कहा- ‘जल्द रोको, यह गंभीर…’

Supreme Court on Aravalli: अरावली में जारी अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अवैध खनन एक गंभीर अपराध है। SC ने भजनलाल सरकार को इसे फौरन रोकने के निर्देश दिए। पढ़ें पूरी खबर...

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A drone view of Aravallis in Ajmer

अजमेर में अरावली पर्वतमाला का ड्रोन से लिया गया दृश्य । (File Photo/ANI)

Supreme Court on Aravalli:अरावली क्षेत्र में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम सुनवाई करते हुए कहा कि अवैध खनन एक गंभीर अपराध है और इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो सकती है। कोर्ट अरावली में खनन और पर्यावरण संबंधी मुद्दों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने के निर्देश दिए।

सीजेआइ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने समिति बनाने के लिए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी और न्यायमित्र के. परमेश्वर को चार सप्ताह के भीतर खनन क्षेत्र के विशेषज्ञ पर्यावरण्विदों और वैज्ञानिकों के नाम सुझाने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि समिति उसके निर्देश और पर्यवेक्षण के तहत कार्य करेगी। कोर्ट ने अरावली की परिभाषा से जुड़े अपने पिछले फैसले पर रोक बरकरार रखा है। कोर्ट इस बात की समीक्षा कर रहा है कि क्या 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ों को अरावली से बाहर रखने के फैसले से पारिस्थितिकी को नुकसान होगा?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हो रहा उल्लंघन

राजस्थान के किसानों की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि 2024 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद राज्य में खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और पेड़ों की कटाई और छिटपुट खनन हो रहा है। इस पर पीठ ने राजस्थान सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह यह सुनिश्चित करे कि क्षेत्र में कोई भी अवैध गतिविधि न हो। इसके बाद पीठ ने राजस्थान सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने आश्वासन दिया कि सरकार तुरंत अवैध खनन रोकने के कदम उठाएगी, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड पर ले लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने लिया था स्वत: संज्ञान

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर उठे विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने ‘अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा तथा उससे जुड़े मुद्दे’ शीर्षक से इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया था। अरावली की नई परिभाषा को लेकर बवाल होने पर अदालत ने पिछले वर्ष 29 दिसंबर को अपने 20 नवंबर के उन निर्देशों को स्थगित कर दिया था, जिनमें इन पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया गया था।

कोर्ट ने क्या कहा था?

इन निर्देशों में अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा स्वीकार की गई थी। कोर्ट ने कहा कि कुछ गंभीर अस्पष्टताओं का समाधान जरूरी है, जिनमें यह आशंका भी शामिल है कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी के मानक से अरावली का बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण से बाहर हो सकता है। कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार कर लिया था और विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले इसके क्षेत्रों के भीतर नए खनन पट्टे देने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

परिभाषा पर उठे कानूनी सवाल

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली पर्वतमाला को सख्ती से परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि भूगर्भीय रूप से इसमें उप-टेक्टॉनिक संरचनाएं भी शामिल हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रारंभिक सुनवाई की मांग की। इस पर सीजेआइ सूर्यकांत ने कहा कि यदि एमिकस या केंद्र से कोई अहम पहलू छूट गया है, तो उस पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।

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