
रोजाना करीब 1,500 रुपए कमाने वाला जोमैटो डिलीवरी राइडर बना एक सफल Entrepreneur
Zomato Delivery Boy Success Story:'वाक़िफ़ कहां ज़माना हमारी उड़ान से, वो और थे जो हार गए आसमान से'
फ़हीम जोगापुरी की ये पक्तियां 28 साल के सूरज बिस्वास पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं।दरअसल, सूरज ने कामयाबी की वो इमारत खड़ी की है, जिसको देखकर न जाने कितने युवा इंस्पायर हो आगे बढ़ेंगे। सूरज की कहानी में जहां सफलता का सुख है तो उनके सैकरीफाइस भी कम नहीं है। पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के एक छोटे से कस्बे चकदह से निकलकर बेंगलुरु में एआई कंपनी खड़ी करने वाले सूरज बिस्वास की कहानी में एक मोड़ ऐसा भी है, जिसे सुनकर गला भर आता है। जनवरी 2024 में, आईएसआई कोलकाता से मिलने वाले ग्रांट की सारी कागजी कार्रवाई पूरी होने के ठीक दो दिन बाद, सूरज के पिता का निधन हो गया। पेशे से पेंटर रहे उनके पिता ने पूरी जिंदगी बेटे के भविष्य के लिए मेहनत की, मगर वह वह दिन नहीं देख पाए जब उनकी मेहनत रंग लाती नजर आई। सूरज कहते हैं कि यह बोझ कभी दिल से नहीं उतरता।
आज 28 साल के सूरज बिस्वास दो स्टार्टअप, डॉट्स-इन और असेसली (Dots-in and Assessli), के फाउंडर और सीईओ हैं। लेकिन यहां तक पहुंचने की राह किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। कभी वह जोमैटो पर खाना डिलीवर करके दिन के करीब एक हजार से पंद्रह सौ रुपये कमाते थे। अंग्रेजी के एक मशहूर मीडिया वेबसाइट से बातचीत में सूरज ने बताया कि उन दिनों को याद कर उन्हें शर्म नहीं आती बल्कि वे गर्व के साथ इसके बारे में बताते हैं।
पढ़ाई की बात करें तो सूरज ने कोलकाता के गुरुनानक इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल साइंस एंड टेक्नोलॉजी से जेनेटिक्स में बीएससी की है। दरअसल पढ़ाई पूरी होने के बाद वह डॉक्टर बनना चाहते थे, बायोलॉजी और इंसानी शरीर व दिमाग को समझने की गहरी दिलचस्पी थी, लेकिन हालात ने वह रास्ता बंद कर दिया। खर्च चलाने के लिए उन्होंने जोमैटो में डिलीवरी पार्टनर की नौकरी शुरू कर दी।
सूरज बताते हैं कि स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किसी एक पल में नहीं हुआ, बल्कि यह उनके फ्रस्ट्रेशन और खुद के प्रति उनके कंविनशन का परिणाम है। उन्होंने भारत के शिक्षा तंत्र में पर्सनलाइजेशन की कमी को बहुत करीब से देखा था। उनका मानना है कि बच्चे इसलिए फेल नहीं होते कि वे नाकाबिल हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि पूरा सिस्टम हर इंसान को एक जैसा मानकर चलता है, जबकि असल में कोई दो इंसान एक जैसे होते ही नहीं।
यहीं से उनके मन में सवाल उठा कि दुनिया की सबसे ताकतवर टेक्नोलॉजी यानी एआई(Artificial Intelligence), आखिर एक-एक इंसान को अलग से समझ क्यों नहीं पाती। हर एआई मॉडल बड़ी आबादी के पैटर्न सीखता है, लेकिन कोई भी मॉडल किसी एक व्यक्ति की खास बायोलॉजी, हालात और वजहों को नहीं समझता। सूरज को यही टेक्नोलॉजी की सबसे बड़ी अनसुलझी समस्या लगी, जिस पर उस वक्त कोई काम नहीं कर रहा था। उन्हें लगा कि अगर यह काम उन्होंने नहीं किया तो शायद कोई और नहीं करेगा, इसलिए नहीं कि वह सबसे होशियार थे, बल्कि इसलिए कि वह इसके लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार थे। साल 2021 में बिना फंडिंग, बिना दफ्तर और बिना किसी को-फाउंडर के उन्होंने अपना सफर शुरू कर दिया।
शुरुआत आसान नहीं थी। सूरज बताते हैं कि सबसे बड़ी मुश्किल भरोसा जीतने की थी। एक छोटे कस्बे से आने वाला, किसी गुमनाम कॉलेज में पढ़ा और बाइक पर खाना डिलीवर करने वाला लड़का जब निवेशकों के सामने अपना आइडिया रखता, तो कोई गंभीरता से सुनने को तैयार नहीं होता था। दूसरी बड़ी दिक्कत पैसों की थी। बुनियादी एआई तकनीक बनाना छह महीने का काम नहीं, इसमें बरसों की रिसर्च, इन्फ्रास्ट्रक्चर और लगातार सुधार लगता है, वह भी तब जब बाजार को यह समझ ही नहीं आता कि आप बना क्या रहे हैं। बिना हार माने और पैसों के लालच में आए बिना उस दौर से निकलना उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा रही।
वे कहते हैं कि आज भी स्टेबल बिजनेस होने के बावजूद संघर्ष खत्म नहीं हुआ है। सूरज कहते हैं कि अब भी सबसे बड़ी चुनौती दुनिया को यह समझाना है कि उनका प्रोडक्ट कोई ऐप या फीचर नहीं, बल्कि एक इन्फ्रास्ट्रक्चर है। जिस तरह लोगों को शुरुआत में ऑपरेटिंग सिस्टम या इंटरनेट को समझने में वक्त लगा था, वैसे ही किसी बड़े बदलाव को समझाना किसी प्रोडक्ट को बेचने से कहीं ज्यादा मुश्किल काम है।
अपने संघर्ष के दौर की सबसे बड़ी कुर्बानी के बारे में पूछे जाने पर सूरज दो बातें गिनाते हैं। पहली, उनके पिता, जिन्होंने पूरी जिंदगी बेटे के भविष्य के लिए अपने आराम की परवाह नहीं की, लेकिन उस मेहनत का फल देखने से पहले ही चले गए। सूरज कहते हैं कि यह कर्ज वह कभी नहीं चुका सकते, इसलिए अब वे इनडॉट्स एनजीओ के जरिए कई बच्चों के सपने पूरे करने में जुटे हैं । दूसरी बात जो उनको अखरती है वो है डॉक्टर बनने का उनका सपना है, जो अधूरा रह गया। हालांकि वह मानते हैं कि किसी अजीब तरीके से उनका मौजूदा काम उसी सपने का सबसे बड़ा रूप है, भले ही वह डॉक्टर नहीं बन पाए, लेकिन अब ऐसी साइंस बना रहे हैं जो इंसानी सेहत और क्षमता को समझने का तरीका बदल सकती है।
आज सूरज बिस्वास बेंगलुरु में रहते हैं, जहां उनका दूसरा स्टार्टअप है, जबकि असेसली की नींव पश्चिम बंगाल में पड़ी थी। नई पीढ़ी को सलाह देते हुए वह कहते हैं कि किसी काम का राइट टाइम आएगा ये एक मिथक है जो काबिल लोगों को भी आरामदायक और छोटा बनाए रखता है। उनके मुताबिक सपने और हकीकत के बीच की खाई हुनर से नहीं, आगे बढ़ते रहने की जिद से भरती है। साथ ही वह यह भी जोड़ते हैं कि किसी की शुरुआत कभी उसकी सीमा तय नहीं करती।
Updated on:
03 Jul 2026 04:31 pm
Published on:
03 Jul 2026 12:44 pm
