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Bengal Election: रेल मंत्रालय ने बदला फैसला, ममता के हाथ से छिना मछली-चिकन का मुद्दा

नॉन-वेज अब खाने का एक विकल्प मात्र नहीं रह गया है, बल्कि चुनाव का एक गरम मुद्दा भी बन गया है। बीते कई चुनावों में यह एक गरम मुद्दा बना है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भी ‘मछ्ली-मांस’ एक मुद्दा बन सकता था, लेकिन केंद्र सरकार ने फिलहाल इसे रोक दिया है।
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कोलकाता

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Vijay Kumar Jha

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Updated: 10 Feb 2026, 5:17 PM IST

IRCTC revised menu for the first vande bharat sleeper train

नॉन-वेज आजकल हर चुनाव में गरम मुद्दा बन जाता है। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)

हावड़ा-कामाख्या वंदे भारत ट्रेन के मुसाफिरों को नॉन-वेज खाना का विकल्प उपलब्ध करा दिया गया है। इस ट्रेन को 17 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाई थी और 22 जनवरी से यात्रियों के लिए शुरू किया गया था। इसके मेनू में नॉन-वेज खाने का विकल्प नहीं दिया गया था तो तृणमूल कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया। इसके बाद रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आश्वासन दिया था कि हावड़ा-कामाख्या वंदे भारत में नॉन-वेज खाना उपलब्ध करा दिया जाएगा। अब रेलवे ने इस ट्रेन के लिए संशोधित मेनू जारी कर दिया।

तृणमूल ने इसे यह कह कर मुद्दा बनाया कि जिन दो इलाकों के लोग नॉन-वेज खाना पसंद करते हैं, उन्हें जोड़ने वाली ट्रेन में केवल वेज खाने का विकल्प दिया गया है। यह उसी मानसिकता का विस्तार है, जिसके तहत प्रधानमंत्री मछली खाने वाले बंगालियों को 'मुगल' मानते हैं।

रेलवे ने तर्क दिया था कि ट्रेन मां कामाख्या मंदिर और मां काली मंदिर वाले दो पवित्र स्थलों को जोड़ती है, इसलिए मेनू में नॉन-वेज खाना नहीं रखा गया।

नॉन-वेज खाने को लेकर समय-समय पर सरकार की तरफ से तरह-तरह से बंदिशें लगाने वाले फरमान आते रहे हैं। ऐसा तब है, जब देश में केवल तीन राज्यों को छोड़ कर, सभी में नॉन-वेज खाने वालों की संख्या बहुमत में है।

देश के किस राज्य में कितने प्रतिशत लोग नॉन-वेज खाते हैं, इस चार्ट में यह आंकड़ा दिया गया है। यह नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 (NFHS5, 2019-21) पर आधारित है। इसमें 15-49 साल के लोगों का आंकड़ा शामिल है।

क्रम संख्याराज्य / केंद्र शासित प्रदेशकुछ भी (अंडा/मछली/चिकन/मांस)अंडामछलीचिकन/मांस
1जम्मू और कश्मीर91.80%87.87%79.96%86.03%
2हिमाचल प्रदेश63.74%60.22%36.47%53.84%
3पंजाब47.33%45.46%21.47%38.79%
4चंडीगढ़71.25%68.48%44.05%61.78%
5उत्तराखंड79.96%77.83%60.91%71.38%
6हरियाणा38.39%36.99%17.22%26.87%
7दिल्ली76.67%74.74%53.62%65.03%
8राजस्थान39.92%38.21%21.53%27.87%
9उत्तर प्रदेश63.87%62.42%52.19%54.45%
10बिहार90.67%85.80%87.96%85.89%
11सिक्किम90.71%88.30%88.20%88.52%
12अरुणाचल प्रदेश99.65%98.89%98.86%98.40%
13नागालैंड99.94%99.02%99.12%99.20%
14मणिपुर99.78%97.21%99.38%97.66%
15मिजोरम100%99.52%97.65%99.56%
16त्रिपुरा99.66%97.48%99.46%98.27%
17मेघालय99.79%97.56%98.69%98.69%
18असम99.66%98.45%99.07%98.63%
19पश्चिम बंगाल99.43%96.59%98.60%97.56%
20झारखंड95.00%92.68%93.10%91.91%
21ओडिशा95.82%88.35%94.36%89.40%
22छत्तीसगढ़87.00%86.24%82.87%83.48%
23मध्य प्रदेश54.96%53.00%43.81%46.03%
24गुजरात50.20%46.13%39.52%44.23%
25दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव82.15%80.02%80.59%80.07%
26महाराष्ट्र82.25%79.72%70.05%77.69%
27आंध्र प्रदेश97.75%96.51%92.34%96.12%
28कर्नाटक87.75%86.35%74.46%80.48%
29गोवा96.67%93.28%95.01%93.96%
30लक्षद्वीप100%99.35%100%99.59%
31केरल98.94%95.00%97.55%96.14%
32तमिलनाडु97.00%95.70%92.25%92.44%
33पुडुचेरी98.79%96.47%96.94%92.34%
34अंडमान और निकोबार द्वीप समूह99.84%97.17%99.47%99.56%
35तेलंगाना97.64%96.57%89.19%95.59%
36लद्दाख93.10%89.85%69.51%83.25%

नॉन-वेज का मुद्दा और चुनावी कनेक्शन

इससे पहले भी कई ऐसे मौके आए जब चुनाव में खान-पान, खास कर नॉन-वेज खाने को मुद्दा बनाया गया। उत्तर प्रदेश में मांस की राजनीति तो खूब हुई है। 2017 के चुनाव के दौरान बीजेपी ने 'अवैध बूचड़खानों' (Illegal Slaughterhouses) को बंद करने का वादा किया था। सरकार बनते ही बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई। राज्य में लगभग हर साल नवरात्रों के दौरान पश्चिमी यूपी के कई जिलों (जैसे गाजियाबाद, मेरठ) में मीट की दुकानें बंद कराए जाते रहे हैं।

कर्नाटक चुनाव (मई 2023) से ठीक एक साल पहले से 'हलाल मांस' के बहिष्कार का मुद्दा चरम पर था। चुनाव के समय यह मुद्दा और गरम हुआ। दक्षिणपंथी संगठनों ने मांग की कि हिंदू 'हलाल' के बजाय 'झटका' मांस खाएं। विधानसभा चुनाव से पहले कई भाजपा नेताओं ने हलाल सर्टिफिकेट को 'आर्थिक जिहाद' करार दिया।

अगस्त 2021 में हरियाणा में नगर निगम चुनावों और त्योहारों के दौरान कई शहरों में मांस की बिक्री पर 9 दिनों के प्रतिबंध के आदेश दिए गए।

गुजरात के अहमदाबाद और वडोदरा में 2021-22 में हुए स्थानीय निकायों के चुनावों से पहले नगर निगमों द्वारा सड़कों पर 'नॉन-वेज' बेचने वाली रेहड़ियों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया गया। नवंबर 2021 में वडोदरा, राजकोट और अहमदाबाद नगर निगमों ने मुख्य सड़कों से नॉन-वेज फूड स्टॉल हटाने का आदेश दिया। इसके पीछे ‘धार्मिक भावनाएं आहत होना’ और ‘मांस की गंध से परेशानी’ जैसे तर्क दिए गए। इस पर गुजरात हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी और पूछा था कि "लोग घर के बाहर क्या खाएंगे, यह निगम कैसे तय कर सकता है?"

अयोध्या जिला प्रशासन ने दस जनवरी को एक ऑर्डर जारी किया, जिसके तहत राम मंदिर के 15 किलोमीटर के दायरे में नॉन-वेज खाने की डिलीवरी बैन कर दी गई है।

2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव ने मछ्ली खाते हुए अपना फोटो सोशल मीडिया पर डाला। उस पर भाजपा ने हमला बोला और कहा कि ये छठ जैसे पवित्र त्योहार के दौरान मछ्ली खाते हैं। इस पर तेजस्वी ने कहा- यह पुरानी फोटो है।

नॉन-वेज क्यों बनता है चुनावी मुद्दा?

वेज बनाम नॉन-वेज एक चुनावी मुद्दे के तौर पर क्यों हर बार उठाया जाता है? आंकड़ों के नजरिए से समझा जाए तो मुख्य रूप से इसके दो कारण सामने आते हैं। एक तो जैसा कि ऊपर के टेबल से साफ है कि तीन को छोड़ कर हर राज्य में नॉन-वेज खाने वाले बहुलता में हैं। इनमें से रोज नॉन-वेज खाने वालों की संख्या नगण्य है (देखिए नीचे का टेबल)। यानि, यह मुद्दा लगभग हर वोटर से जुड़ा है और किसी खास मौके (त्योहार आदि) पर बैन की मांग से धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ जाती है। चूंकि, रोज खाने वाले लोग गिनती के हैं, इसलिए बैन से लोगों को असुविधा जैसी कोई समस्या पैदा होने का खतरा नहीं है।

नॉन-वेज दैनिक (Daily)साप्ताहिक (Weekly)कभी-कभी (Occasionally)
चिकन/मांस2.45%52.83%44.72%
अंडा7.89%57.55%34.56%
मछली8.39%48.20%43.41%

दूसरा कारण यह भी समझ में आता है कि सबसे गरीब लोग सबसे ज्यादा नॉन-वेज खाते हैं। NFHS5 के मुताबिक सबसे गरीब लोगों में से 83 फीसदी पुरुष और 92 फीसदी महिलाएं नॉन-वेज खाती हैं। यह वर्ग नेताओं से किसी ठोस, व्यावहारिक वादे या एक्शन की अपेक्षा को लेकर ज्यादा मुखर नहीं होता और नेताओं को भी लगता है कि इस तबके को भावनात्मक मुद्दों को गरमा कर जोड़ना अपेक्षाकृत आसान होता है।

समृद्धि के हिसाब से कौन वर्ग कितना नॉन-वेज खाता है?

समृद्धि के हिसाब से वर्गनॉन-वेज खाने वाली महिलाएं नॉन-वेज खाने वाले पुरुष
सबसे गरीब (Poorest)83.03%92.44%
गरीब (Poorer)77.87%90.20%
मध्यम (Middle)76.10%88.32%
अमीर (Richer)72.86%85.79%
सबसे अमीर (Richest)64.19%78.54%

गणतंत्र दिवस पर भी नॉन वेज बैन

धर्म-संस्कृति से अलग हट कर इस बार तो बात ‘राष्ट्रीयता’ तक जा पहुंची। ओड़िशा के कोरापुट जिले में इस बार गणतंत्र दिवस पर नॉन-वेज पर बैन लगा दिया गया था। डीएम के इस आदेश का जम कर विरोध हुआ। तब इसे वापस लिया गया। सफाई दी गई कि गणतंत्र दिवस कार्यक्रमों की जिला स्तरीय तैयारी समितियों के सुझाव पर यह फैसला लिया गया था।

बता दें कि कोरापुट आदिवासी बहुल जिला है। नॉन-वेज खाना आदिवासियों की परंपरा-संस्कृति से जुड़ा है। वैसे भी ओड़िशा की करीब 86 फीसदी जनता नॉन-वेज खाने वाली है।

बैन हटाने की भी मांग

अलग-अलग कारणों से जहां बैन लगाया जाता है, वहीं कुछ कारणों से बैन हटाने की भी मांग की जाती है। महराष्ट्र के वित्त व योजना विभाग के मंत्री आशीष जायसवाल ने हाल ही में वन विभाग से मांग की है कि संरक्षित जंगलों, अभयारण्यों और टाइगर रिजर्व्स में बने रेस्ट हाउसेज में नॉन-वेज खाना परोसे जाने की इजाजत दें। इस मांग का कारण आर्थिक बताया गया है। जायसवाल का कहना है कि नॉन-वेज खाना नहीं होने के चलते पर्यटक निजी होटलों में ठहरने चले जाते हैं। इससे सरकार को नुकसान होता है।

वन्य क्षेत्रों में नॉन-वेज खाने पर बैन की नीति करीब एक दशक पुरानी है। इसे वन्य जीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लागू किया गया था।

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