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बहुमत से क्यों चूकी भाजपाः आत्ममंथन करेगा ‘संघ परिवार’, गिले-शिकवे होंगे दूर

लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूक जाने और संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयानों और ऑर्गनाइजर में छपे लेख में पार्टी की कार्यप्रणाली की आलोचना के बाद राजनीतिक गलियारे में घमासान मच गया है। पढ़िए अनंत मिश्रा की विशेष रिपोर्ट…

नई दिल्लीJun 15, 2024 / 01:58 pm

Shaitan Prajapat

लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूक जाने और संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ बयानों और ऑर्गनाइजर में छपे लेख में पार्टी की कार्यप्रणाली की आलोचना के बाद राजनीतिक गलियारे में घमासान मच गया है। इस बीच, संघ परिवार नतीजों को लेकर बड़ा आत्ममंथन करने जा रहा है। भाजपा सहित 36 सहयोगी संगठनों के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच 31 जुलाई से 3 सितंबर के बीच केरल के पलक्कड़ में होने जा रही राष्ट्रीय समन्वय बैठक में नतीजों की समीक्षा होगी। इस बैठक में भाजपा के अध्यक्ष, संगठन महामंत्री प्रमुख रूप से मौजूद रहेंगे। बैठक में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के बीच समन्वय या अन्य स्तर पर सामने आईं शिकवा-शिकायतें भी दूर होंगी। सभी संगठनों के फीडबैक से सबक लेते हुए भाजपा को आगे की रणनीति पर कार्य करने का सुझाव जारी होगा।

संघ-भाजपा में खटपट की बातें क्योंः

नड्डा के बयान से शुरू हुई हलचल

  • नड्डा ने क्या कहाः चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक इंटरव्यू में कह दिया कि ‘आज भाजपा खुद सक्षम है और उसे संघ की जरूरत नहीं है।’
  • अर्थ निकालाः निचले स्तर पर तो उचित संदेश नहीं गया। माना गया कि कुछ सब कुछ ठीक नहीं है।
  • सफाईः भाजपा का कहना है कि नड्डा की बातों को सही संदर्भ में नहीं समझा गया।

भागवत की सीख से मचा हंगामा

  • मोहन भागवतः जिसमें अहंकार नहीं होता, वो ही सेवक कहलाने का अधिकारी होता है।
  • अर्थ निकलाः नतीजों से नाराज संघ प्रमुख ने भाजपा को संकेतों में सीख दी है कि नेताओं में
    सत्ता का अहंकार नहीं आना चाहिए
  • सफाईः भागवत ने किसी व्यक्ति, सरकार या दल विशेष के लिए नहीं कही। सेवक शब्द का इस्तेमाल स्वयंसेवकों के लिए किया। तीन मिनट के संक्षिप्त वीडियो नहीं पूरे बयान को सुनने की जरूरत है। संघ प्रमुख जब बोलते हैं तो वे समाज के सभी हितधारकों के लिए बोलते हैं।
  • मोहन भागवतः एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। इससे पहले 10 साल शांत रहा। अचानक जो कलह वहां पर उपजा या उपजाया गया, उसकी आग में अभी तक जल रहा है।
    इस पर कौन ध्यान देगा?
  • निकला अर्थ- माना गया है कि मणिपुर में शांति लाने के सरकारी प्रयासों से संघ संतुष्ट नहीं है। संघ को लगता है कि जितना ध्यान देना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया।
    संघ की सफाईः मणिपुर में शांति लाने की जिम्मेदारी पक्ष-विपक्ष, समाज सबकी है। संघ प्रमुख का बयान समाज की पीड़ा दिखाता है न कि किसी पर दोषारोपण।

शारदा के आलेख से आग में घी

  • रतन शारदा ने ऑर्गनाइजर में लिखाः भाजपा को अति आत्मविश्वास ले डूबा। भाजपा नेता अपने बुलबुले में खुश थे। मोदी की चमक का आनंद ले रहे थे, इसलिए वो सड़कों पर लोगों की आवाज सुन ही नहीं पाए।
  • निकला अर्थ- संघ ने ऑर्गनाइजर के जरिए भाजपा से उसकी कार्यप्रणाली के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए सुधार की जरूरत बताई है
  • संघ की सफाईः ऑर्गनाइजर संघ का मुखपत्र नहीं है। उसमें लेखक का विचार उसका विचार होता है। यह संघ का विचार नहीं है।

इंद्रेश कुमार के सीधे आरोप से बवाल

  • इंद्रेश कुमारः भाजपा के अहंकार ने उसे 241 पर रोक दिया
  • निकला अर्थः मोहन भागवत की संकेतों में कही गई बातों को इंद्रेश कुमार ने और स्पष्ट कर दिया
  • संघ की सफाईः यह इंद्रेश कुमार का निजी बयान है, संघ का आधिकारिक बयान नहीं है।

आज भागवत से मिलेंगे योगी

संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से शनिवार को गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भेंट करेंगे। लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद यह भाजपा के किसी नेता की सरसंघचालक से पहली भेंट है। दरअसल, संघ शिक्षा वर्ग की बैठक के सिलसिले में भागवत का गोरखपुर प्रवास है। संघ पदाधिकारियों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी का गृह जनपद होने के कारण यह शिष्टाचार भेंट है।

खुल गई बंद मुट्ठी…

कहावत है, ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो… ’ लगता है लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भाजपा की बंद मुट्ठी खोल दी है। तभी तो उम्मीदों के मुताबिक नतीजे नहीं आने से ‘विचार परिवार’ में ऊपर से लेकर नीचे तक खलबली मची हुई। दावा ‘चार सौ पार’ का था लेकिन ‘तीन सौ’ के भी लाले पड़ गए। ऐसे में सवाल तो खड़ा होना ही था कि, आखिर चूक हुई तो कहां? पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इशारों-इशारों में तीर चलाया। फिर इंद्रेश कुमार ने नतीजों को अहंकार से जोड़ा, तो नागपुर से लेकर दिल्ली तक हलचल मच गई। इंद्रेश कुमार के बयान से संघ ने पल्ला झाड़ लिया। आनन-फानन में मामले को ठंडा करने के प्रयास तेज हो गए। संघ-भाजपा की समन्वय बैठक केरल में होने की जानकारी भी सामने आ गई। लेकिन असली सवाल का जवाब जनता जानना चाहती है। सवाल ये कि भगवत-इंद्रेश के जो बयान आए हैं क्या वे चुनाव से पहले नहीं आने चाहिए थे? अगर संघ को लगता है कि भाजपा के नेता पटरी से उतर रहे हैं तो उसने नतीजों का इंतजार क्यों किया? एक और सवाल, कि अगर नतीजे भाजपा की उम्मीदों के मुताबिक ही आते तो संघ क्या करता? भाजपा और संघ के बीच तीन महीने पहले नागपुर में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बैठक हुई थी। लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से तीन दिन पहले शुरू हुई इस बैठक में तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई होगी। किसको, क्या और कैसे करना है, सब कुछ तय हुआ होगा। फिर खामी कहां रह गई? आमतौर पर संघ-भाजपा के बीच पर्दे के पीछे होने वाली वैचारिक खीचतान की खबरें बाहर नहीं आती है। इस बार जो ध्वनि सुनाई दे रही है उसकी गूंज देर तक और दूर तक सुनाई देने के आसार है।

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