
प्रदर्शनी में आने वाले प्रबुद्धजनों को अपनी कला के बारे में जानकारी देते हुए।
नीमच. कहते हैं कि कला किसी पहचान की मोहताज नहीं होती। यह बात सच होती दिखाई भी दी। मध्यप्रदेश से एकमात्र कलाकार रहे तारापुर के पवन झरिया जिन्होंने जी-20 सम्मेलन में अपनी हस्तशिल्प कला का प्रदर्शन किया। नांदना प्रिंट, दाबू प्रिंट, इंडिगो प्रिंट आदि को आज इस गांव के एक परिवार ने जीवित रख रखा है। जी-20 सम्मेलन में विदेशी मेहमानों ने इस कला की खूब तारीफ की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पवन को उनकी कला के लिए बधाई दी। यह नीमच जिले ही नहीं प्रदेश के लिए भी बड़े गर्व की बात है।
पूरी तरह प्राकृतिक रंग से तैयार होते हैं कपड़े
दरअसल कुछ वर्ष पूर्व तक पूरे गांव में इस कला के माध्यम से ही लोगों की आजीविका निर्भर थी। समय के साथ पीढ़ी इस कला से दूर होती चली गई। पूरे गांव में मात्र एक परिवार ही इस कला को जीवित रख हुए है। आज पूरे विश्व में इस कला का लोहा मनवा रहे हैं। हस्तशिल्प कलाकार पवन झरिया के अनुसार जब मध्यप्रदेश हस्तशिल्प बोर्ड से उन्हें जी-20 सम्मलेन में जाने का निमंत्रण मिला तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने एक पल की भी देरी नहीं की और तुरंत भारत सरकार के इस कार्यक्रम में अपनी सहभागिता की। कुछ वर्ष पूर्व तक इस कला से बनाए कपड़े आदिवासी समुदाय ज्यादा पहनते थे, लेकिन फैशन की दुनिया में यह कला थोड़ी दब सी गई थी। अब एक बार फिर इस ओर लोगों का रुझान बढ़ा है। पवन के अनुसार इस कला को कई विदेशी मेहमानों ने पसंद किया। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस कला के मुरीद हुए। दरअसल इस हस्तशिल्प कला से बनने वाले साड़ी व बेड शीट को करीब 18 प्रकार की तकनीक से गुजारा जाता है, तब जाकर वो कला निखरती है। इस कला में हर्बल कलर का उपयोग होता है जिनसे साइड इफेक्ट नहीं होता। सबसे पहले कपड़े को धोकर सुखाया जाता है। इसके बाद एक बार फिर कपड़े के मांडा निकालने के लिए अरंडी का तेल या सोडे का उपयोग किया जाता है। हरड़ पावडर से रंगाई की जाती है। इसके बाद इमली के बीज के पावडर से पेस्ट बनाकर और फिटकरी से प्रिंट करते हैं। इसके बाद बिचलाई की जाती है। उसके बाद आलिजरीन एवं धावड़े के फूलों से रंगाई की जाती है। रंगाई के बाद धुलाई की जाती है। काली मिट्टी, गोंद एवं चूने का पेस्ट बनाकर दाबू प्रिंट किया जाता है फिर इंडिगो से तीन बार धुलाई की जाती है। रंगाई के बाद दाबू निकाली जाती है जो की 8 बार किया जाता है। इसके बाद पुन: गोंद, चूने का पेस्ट बनाकर प्रिंट किया जाता है। इसके बाद अनार के छिलके को उबालकर दो बार रंगाई की जाती है। कपड़े पर फिटकरी के पानी में रंगाई की जाती है। सोडे एवं गर्म पानी में हाजी लगाया जाता है। कपड़े को सामान्य पानी से धोया जाता है। कलप लगाकर प्रेस किया जाता है, तब जाकर पहनने लायक कपड़ा तैयार होता है। समय के अनुसार अब यहां नंदना प्रिंट के अलावा, दाबू प्रिंट, इंडिगो प्रिंट पर भी ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसका मूल कारण है लोगों की पसंद। इस हस्तशिल्प के सबसे ज्यादा मुरीद विदेशी हैं जो लगातार तारापुर में आते रहते हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी विजिट कर कपड़ों की खरीदारी करते हैं। बाजार में मिलने वाले और यहां तैयार होने वाले कपड़ों की दरों में वृद्धि जरूर है, लेकिन इसकी कीमत वृद्धि होने का मुख्य कारण इसमें लगने वाला समय, मजदूरी और प्राकृतिक रंग है जिसे बनाने में भी काफी समय लगता है। इस कपड़े को रंगने में सोडा, इमली के बीज का चूर्ण, हल्दी, गोंद, अनार छिलका, सोडा, काली मिट्टी, चूने का पेस्ट, हरड़ पावडर, अलीजरीन धावड़े के फूल, अरंडी का तेल सहित कई प्राकृतिक वस्तुओं का चयन किया जाता है। कपड़ा बनने में लगने वाले 18 दिन इसके चलते ही इसकी कीमत थोड़ी ज्यादा लगती है। साथ ही पत्तों के माध्यम से भी कपड़ों पर कलाकारी उकेरी जाती है। इसके चलते विदेशी मेहमानों के दिल में यह कला घर कर जाती है।
मिल चुके हैं पवन को कई पुरस्कार
तारापुर के पवन बताते हैं कि इस कला को कई मंच मिले हैं। राज्य स्तरीय, कॉलेज सेमिनार, राष्ट्रीय स्तर पर भी इस कला के चलते उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से भी कई बार सम्मान का मौका मिला है। यही कारण है कि इस कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं। पवन बताते हैं कि दिल्ली में आयोजित जी-20 सम्मेलन में कई देशों के प्रतिनिधि मंडल ने इस कला की जमकर तारीफ की। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जमकर तारीफ की।
Published on:
13 Sept 2023 12:31 pm
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